भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

( ३०२ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ पातञ्जल-

पृथिव्यादितत्त्वोंका चिह्न कहते हैं । पृथिवीतत्त्व चलनेपर चित्तका स्थैर्य होता है जलसे कामाद्रेक होता है । अग्नितत्त्वसे क्रोध और सन्ताप होते हैं । वायुतत्त्वसे चित्त चञ्चल होता है और आकाशतत्त्व चलनेपर शून्यता अथवा धर्मभावना होती है ॥ ८४ ॥ श्रुत्योरङ्गुष्ठकौ मध्यांगुल्यौ नासापुटद्वये । सृक्किणोः प्रान्त्यको- पान्त्याङ्गुली शेषे दृगन्तयोः ॥ न्यस्यान्तर्भूत्पृथिव्यादितत्त्वज्ञान भवेत् क्रमात् । पीतश्वेतारुणश्यामैर्बिन्दुभिर्निरुपाधि सम् ॥” इत्यादिना ॥ ८५ ॥ दोनों अङ्गूठोंसे दोनों कर्णको दोनों मध्यमा अंगुलियोंसे दोनों नासापुटको और दोनों हाथोंकी कनिष्ठिका और अनामिकासे ओष्ठको अवशिष्टअंगुली ( तर्ज नी ) से नेत्रको दबाकर एकाग्रचित्त होनेसे अन्तःकरणमें पृथिव्यादि तत्त्वका ज्ञान होता है पीत, श्वेत, अरुण ( लाल ) श्याम और रत्नविन्दुसे पृथिव्यादि लक्षित होते हैं निरुपाधि होनेसे आकाश बिन्दुरूपसे लक्षित होता है ॥ ८५ ॥ यथावद्वायुतत्त्वमवगम्य तन्नियमने विधीयमाने विवेकज्ञानां- वरणकर्मक्षयो भवति । तपो न परं प्राणायामादिति । “दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । प्राणायामैस्तु दह्यन्ते तद्वदिन्द्रियपन्नगाः ॥ ” इति च ॥ ८६ ॥ वायुतत्त्वको यथार्थ जानकर उसका नियमन करनेसे विवेक ज्ञानका आवरण जो कर्म है उसका क्षय होता है प्राणायामसे बढकर कोई तप नहीं है अग्निमें तपानेसे जिस प्रकार सुवर्णादिका मल जल नष्ट हो जाता है तिसी प्रकार प्राणायामसे इन्द्रि- यरूप सर्प भस्म हो जाते हैं इति ॥ ८६ ॥ तदेवं यमादिभिः संस्कृतमनस्कस्य योगिन संयमप्रत्याहार कर्त्तव्य । चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां प्रतिनियतरञ्जनीयकोपनी- यमोहनीयप्रवणत्वप्रहाणेनाविकृतस्वरूपप्रवणचित्तानुकारः प्र- त्याहार इन्द्रियाणि विषयेभ्य प्रतीपमाह्रियन्तेऽस्मिन्निति व्युत्पत्ते ॥ ८७ ॥ इस प्रकार यमनियमादिसे शुद्ध चित्त योगीको संयमप्रत्याहार करना चाहिये चक्षुरादि इन्द्रियोंको नियत राग द्वेष मोहजनक शब्द स्पर्श रूप रस गन्धादि विषयमें असाधारणतया प्रवृत्त चित्तको हटाकर अन्तर्मुखमे स्वरूपम स्थिर करना प्रत्याहार है