सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३०३ ) इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर स्वसमीप प्राप्त किया जाय जिस समाधिमें उसका नाम प्रत्याहार हे ऐसी प्रत्याहारशब्दकी व्युत्पत्ति है ॥ ८७ ॥ ननु तदा चित्तमभिनिविशते नेन्द्रियाणि तेषां बाह्यविष- यत्वेन तत्र सामर्थ्याभावादतः कथं चित्तानुकारः अद्धा अत- एव वस्तुतस्तस्यासम्भनमभिसन्धाय सादृश्यार्थमिवशब्दञ्च सूत्रकारः स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रि- याणां प्रत्याहार इति ॥ ८८ ॥ यदि कहो इन्द्रिय बाह्य विषय होनेसे अन्तर्विषय चित्तके साथ तदाकार कैसे सम्भव होगा यहभी नहीं कह सकते क्योंकि वास्तवमें तदाकार असम्भव होनेपरभी तत्सादृश्य सम्भव हो सकता है अतएव सूत्रकारनेभी इवशब्दका प्रयोग किया स्वस्वविषयमें अप्रवृत्ते' होनेसे चित्तस्वरूपानुकरणके समान इन्द्रियोंका प्रत्याहार है इति ॥ ८८ ॥ सादृश्यञ्च चित्तानुकारनिमित्तं विषयासम्प्रयोगः । यदा चित्तं निरुध्यते तदा चक्षुरादीनां निरोधे प्रयत्नान्तरं नापेक्षणीयं यथा मधुकरराजं मधुमक्षिका अनुवर्त्तन्ते तथेन्द्रियाणि चित्त- मिति । तदुक्तं विष्णुपुराणे "शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्या- क्षाणि योगवित् । कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥” इति ॥ वश्यता परमा तेन ज्ञायतेऽतिचलात्मनः । इन्द्रि- याणामवश्यैस्तैर्योगी योगस्य साधकः ॥” इति च ॥ ८९ ॥ सादृश्यकीभी चित्ताकारस्थिति निमित्तविषयमें अप्रवृत्ति है जब चित्त रुक जाता है तब चक्षुरादिकी निवृत्तिके लिये प्रयत्नान्तरकी अपेक्षा नहीं होती जिस प्रकार मधुकरराजके चलनेपर मधुमक्षिका सभी चलती हैं स्थिर होनेपर स्थिर हो जाती हैं तिसी प्रकार चित्तके स्थिर होनेपर सब इन्द्रियें स्थिर हो जाती हैं योगक्रियाको जाननेवाले प्रत्याहारपरायण होकर शब्दादिविषयोंमें आसक्त इन्द्रियोंको चित्तकी समान करें चंचलात्माको उससे अतिशय वश्यता होती है ॥ ८९ ॥ नाभिचक्रहृदयपुण्डरीकनाड्यग्रादावाध्यात्मिके हिरण्यगर्भ- वासप्रजापतिप्रभृतिके बाह्ये वा देशे चित्तस्य विषयान्तरपरि- हारेण स्थिरीकरणं धारणा । तदाह देशबन्धश्चित्तस्य धारणेति ।