भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ३०४ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- पौराणिकाश्च-“प्राणायामेन पवन प्रत्याहारेण चेन्द्रियम् । वशीकृत्य ततः कुर्याच्चित्तस्थानं शुभाश्रयम् ॥” इति । तस्मिन् देशे ध्येयावलम्बनस्य प्रत्ययस्य विसदृशप्रत्ययप्रहा- णेन प्रवाहो ध्यानम् । तदुक्तं 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्' इति । अन्यैरप्युक्तम्-“तद्रूपप्रत्ययैकाग्र्या सन्ततिश्चान्य- निस्पृहा । तद्ध्यान प्रथमैरंगैः षड्भिर्निष्पाद्यते तथा ॥” इति ॥ ९० ॥ नाभिचक्र, हृदयपुण्डरीक, नासिकाके अग्रभागादि आध्यात्मिकमें अथवा हिर- ण्यगर्भवास, प्रजापति प्रभृति बाह्यदेशमें विषयान्तरसे हटाकर चित्तको स्थिर करना धारणा है अतएव सूत्रकारने देशबन्धको चित्तकी धारणा कहा पौराणिकोंनेभी प्राणायामसे पवन और प्रत्याहारसे इन्द्रियको वश करके अनन्तर शुभ स्थानमें चित्तको स्थापन करना कहा है जिस देशमें चित्तको रोका (धारणा) है उस देशमें ध्येयावलम्बन (जिस को ध्यान किया हो) बुद्धिका उस ध्येयसे अन्यविषयोंमें न जाने देकर एकरूप प्रवाह होनेका नाम ध्यान है (ऐसा सूत्रकारनेभी) कहा है अन्य विषयोंसे निस्पृह होकर जो एक देह माना हो उसमें एकाग्रता बढाना ध्यान है यह पूर्वोक्त यम नियम आर प्रत्याहारादि ६ अंगोंसे होता है ऐसा पौराणिकों- नेभी कहा है ॥ ९० ॥ प्रसंगाच्चरममंग प्रागेव प्रात्यपीपदाम । तदनेन योगांगानुष्ठा नेनादरनैरन्तर्यदीर्घकालासेवितेन समाधिप्रतिपक्षक्लेशप्रक्षयेऽ- भ्यासवैराग्यवशान्मधुमत्यादिसमाधिलाभो भवति ॥ ९१ ॥ समाधिरूप आठवें अङ्गको प्रथमही कह चुका हू उक्त योगांगको आदरपूर्वक निरन्तर दीर्घ कालतक अनुष्ठान करनेसे समाधिके प्रतिद्वन्द्वी क्लेश क्षीण होनेपर अभ्यास और वैराग्यवश मधुमति ज्योतिष्मति आदि समाधियें प्राप्त होती है ॥ ९१ ॥ अथ किमेवमकरयादस्मानतिविकटाभिरत्यन्ताप्रसिद्धाभि कर्णाटगौडलाटभाषाभिर्भीपयते भवान् । न हि वयं भवन्तं भीषयामहे किन्तु मधुमत्यादिपदार्थव्युत्पादनेन तोषयाम । ततश्चाकुतोभयेन भवता श्रूयतामवधानेन ॥ ९२ ॥