सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १०५ ) प्रश्न-अहो क्यों आप अकस्मात् अत्यन्त अप्रसिद्ध व अतिकठोर कर्णाटक गोड लाट भाषाओंसे हम लोगोंको डराते हो । उत्तर-नहीं नहीं, म डरता नहीं हूं मधुमत्यादिपदार्थको व्युत्पादन करके प्रसन्न करता हूं ॥ ९२ ॥ तत्र मधुमती नामाभ्यासवैराग्यादिवशादपास्तरजरतमोलेश- सुखप्रकाशमयसत्त्वभावनयानभ्यवैशारद्याद्द्योतनरूपऋतम्भर प्रज्ञाख्यासमाधिसिद्धि । तदुक्तम् 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' इति । ऋतं सत्यं बिभर्त्ति कदाचिदपि न विपर्ययेणाच्छाद्यते तत्र स्थितौ दार्ढ्ये सति द्वितीयस्य योगिन सा प्रज्ञा भवती- त्यथ ॥ ९३ ॥ सावधानचित्तसे सुनिये । मधुमति उसको कहते ह जो अभ्यास और वैराग्यसे रजस्तमोगुणशून्य सुख एवं प्रकाशरूप सत्त्वभावनाके स्वच्छ और स्फुटप्रकाशरूप ऋतम्भरप्रज्ञा समाधि सिद्धि हो ऋत अर्थात् सत्यको भरण करे कभीभी विपरीतसे आच्छादित न हो उस स्थितिमे दृढ होनेसे द्वितीययोगीको वही प्रज्ञा होती है॥९३॥ चत्वार खलु योगिन प्रसिद्धाः प्रथमकल्पिकों मधुभूमिकः प्रज्ञाज्योतिरतिक्रान्तभावनीयश्चेति । तत्राभ्यासी प्रवृत्तमा- त्रज्योति प्रथमः । न त्वनेन परचित्तादिगोचरज्ञानरूप वै ज्योतिर्वशीकृतमित्युक्तं भवति । ऋतम्भरप्रज्ञो द्वितीय । भूतेन्द्रियजयी तृतीय । परवैराग्यसम्पन्नश्चतुर्थ ॥ ९४ ॥ चार प्रकारके योगी होते हैं प्रथम कल्पिक, मधुभूमिक, प्रज्ञाज्योति और अति क्रान्तभावनीय अभ्यास करनेवाले प्रवृत्तमात्र ज्योति प्रथम है । उन्होंने परचित्त- ज्ञानरूप ज्योतिको वश नहीं किया है । ऋतम्भर प्रज्ञा द्वितीय है । भूत और इन्द्रि- यको जय करनेवाले तीसरे हैं । परवैराग्यसम्पन्न चौथे हैं ॥ ९४ ॥ मनोजवित्वादयो मधुप्रतीकसिद्धय । तदुक्त मनोजवित्वं विक- रणभावः प्रधानजयश्चेति । मनोजवित्वं नाम कायस्य मनो- वदुत्तमो गतिलाभ । निकरणाभार कायनिरपेक्षानमिन्द्रि- याणामभिमतदेशकालविषयापेक्षवृत्तिलाभ । प्रधानजयः प्रकृतिविकारेषु सर्वेषु वशित्वम् ॥ ९५ ॥ २-