भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ३०६ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ पातञ्जल- मनोजवित्व, विकरणभाव, प्रधान जय, प्रभृति मधुप्रतीक सिद्धि है । मनके समान गति शरीरकी हो जाना मनोजवित्व है । शरीरनिरपेक्ष होकर इन्द्रियोंको देशकालादि अपेक्षित विषयप्राप्ति विकरणभाव है । प्रकृतिके विकार महदादिको वश करना प्रधान जय है ॥ ९५ ॥ एताश्च सिद्धय करणपञ्चकस्वरूपजयात् तृतीयस्य योगिन प्रादुर्भवन्ति । यथा मधुन एकदेशोऽपि स्वदते तथा प्रत्ये- कमेव ता सिद्धय स्वदन्त इति मधुप्रतीका सर्वभावाधिष्ठा- तृत्वादिरूपा विशोका सिद्धि । तदाह, सत्त्वपुरुषान्यताख्या- तिमात्रप्रतिष्ठस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञत्वं चेति । सर्वेषां व्यवसायाव्यवसायात्मकाना गुणपरिणामरूपाणा भावाना स्वामिवदाक्रमणं सर्वभावाधिष्ठातृत्व तेषामेव शान्तोदिताव्य- पदेश्यधर्मित्वेन स्थिताना विवेकज्ञान सर्वज्ञातृत्वम् । तदुक्तं विशोका वा ज्योतिष्मतीति ॥ ९६ ॥ यह सिद्धिया करणपञ्चकजयसे तृतीय योगीको प्राप्त होती है जिस प्रकार मधुके एक देशकाभी आस्वादन किया जाता है । तिसी प्रकार प्रत्येक सिद्धिका आस्वादन किया जाता है । मधुप्रतीक समस्त वस्तुका अधिष्ठातृत्वरूप विशोक सिद्धि है । कहा है सत्त्व पुरुषको अन्यत्व भेद ख्यातिमात्र प्रतिष्ठितको समस्त- वस्तुका अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञत्व होता है समस्त व्यवसायाव्यवसाया- त्मक गुणपरिणामरूप भावको स्वामीके समान आक्रमण करना सर्वभावाधिष्ठातृत्व है उसीको शान्तोदिता व्यपदेश ( व्यवहार ) से स्थितोंका विवेकज्ञानही सर्वज्ञातृत्व है । तदुक्तम्-विशोका ज्योतिष्मतीति ॥ ९६ ॥ सर्ववृत्तिप्रत्यस्तमये परं वैराग्यमाश्रितस्य जात्यादिबीजानां क्लेशानां निरोधसमर्थो निर्बीज समाधिः असम्प्रज्ञातपदवेद- नीयः संस्कारशेषताव्यपदेश्यः चित्तस्यावस्थाविशेषः । तदुक्तं, 'विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः' इति ॥ एवञ्च सर्वतो विरज्यमानस्य तस्य पुरुषधौरेयस्य क्लेशबीजानि च निर्दग्धशालिबीजकल्पानि प्रसवसामर्थ्यविधुराणि मनसा सार्द्धं प्रत्यस्तं गच्छन्ति ॥ ९७ ॥

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