भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ३०७ ) समस्त वृत्तियोंके लय होनेपर परवैराग्यसे जात्यादि बीजके निरोधमे समर्थ निर्बीज समाधि है । असम्प्रज्ञातपदवाच्य संस्कारविशेषरूप चित्तकी अवस्थाविशेष है । यही सूत्रकारनेभी विरामेत्यादिसे कहा है । एव समस्त वस्तुओंमे विरक्त श्रेष्ठ पुरुषके भुने हुए धानाकी समान क्लेश बीज उत्पत्तिप असमर्थ होकर मनके साथही नष्ट हो जाते हैं ॥ ९७ ॥ तदेतेषु प्रलीनेषु निरुपप्लवविवेकख्यातिपरिपाकवशात् कार्य्य- कारणात्मकानां प्रधाने लयः चितिशक्तिस्वरूपप्रतिष्ठा पुनर्बु- द्धिरात्ताभिसम्बन्धविधुरा कैवल्यं लभते इति । सिद्धिद्वयी च मुक्तिरुक्ता पतञ्जलिना ‘पुरुषार्थशून्यानां प्रतिप्रसवस्वरूप- प्रतिष्ठा वा चितिशक्ति’ इति ॥ ९८ ॥ गुणादिकेके नष्ट होनेपर निरुन्तगयविवेकख्यातिके परिपाकसे कार्यकारणात्मक स्थूल सूक्ष्मभूतादिक प्रधानमें लीन होता है चितिशक्ति ( आत्मा ) असङ्गादिसरू- पस्थ होता है अनन्तर बुद्धिके साथ सम्बन्ध न होनेमे कैवल्य ( मोक्ष ) प्राप्त होताहै उक्त कार्यकारणात्मक गुणोंको प्रधानमें लय और स्वरूपप्रतिष्ठारूप सिद्धि द्वयात्मक मुक्ति पतञ्जलिनेभी कही है पुरुषार्थशून्यानामित्यादि ॥ ९८ ॥ न चस्मिन् सत्यपि कस्मान्न जायते जन्तुरिति वदितव्यं कार- णाभावात् कार्य्याभाव इति प्रमाणसिद्धार्थे नियोगानुयोगयोर- योगात् । अपरथा कारणाभावेऽपि कार्य्यसम्भवे मणिवेधाद्- योऽन्धादिभ्यो भवेयुः तथाचानुपपन्नार्थतायामाभाणको लौ किक उपपन्नार्थो भवेत् । तथाच श्रुति –‘अन्धो मणिमविन्दत्’ अविध्यत् तमनङ्गुलिराप्तात् गृहीतवान् अग्रीवः प्रत्यमुञ्चत् पिनद्धवान् तमजिह्वो वा असस्तुत अभ्यपूजयत् स्तुतवानिति यावत् ॥ ९९ ॥ यदि शंका करें कैवल्य होनेपरभी जीवको पुनः संसारमें जन्ममरणादि क्यों नहीं होते अद्वैतियोंके समान अविद्यारूपोपाधि नष्ट होनेपर तादृशोपाधिकृत जीवस्वरू- पभी नष्ट होकर निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्मतत्त्वही रहता है जिस प्रकार घट नष्ट होनेसे घटाकाश कोई चीज नही महाकाशही रहता है यह पातञ्जलके मतमें कह नहीं सकते क्योंकि उनके मतमें जीव और ईश्वर भिन्न हैं ओर दोनों नित्य हैं। ईश्वरप्रणिधानसे मुक्तिसाध्य कहा है । प्रतिबिम्बप्रतिबिम्बीमें ध्यानध्येय मानना अविद्याकी पग