सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल-
काष्टा है। अतः पातञ्जलके मतमें पुनः उत्पत्ति अनिवार्य होगी तो उसका उत्तर- कारणके न रहनेपर कार्य नहीं होता है इसमें किसीकी विप्रतिपत्ति नही । यदि कारणाभावमेंभी कार्य होता तो अन्धभी मणिको भेदन करने लगेगा जिसके अंगुली न हो वहभी मुटीमें ग्रहण करने लगेगा, जिसके हाथ न हो वह वस्त्र बुनने लगेगा जिह्वा न होनेपरभी स्तुति करने लगेगा अपरिचितभी पूजा करने लगेगा ॥ ९९ ॥ एवञ्च चिकित्साशास्त्रवद्योगशास्त्रं चतुर्व्यूहम् । यथा चिकित्सा- शास्त्रं रोगो रोगहेतुरारोग्यं भेषजमिति तथेदमपि संसारः संसारहे- तुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखमयः संसारो हेयः प्रधानपुरु- षयोः संयोगो हेयभोगहेतुः तस्यात्यन्तिकी निवृत्तिर्हानं तदु- पायः सम्यग् दर्शनम् । एवमन्यदपि शास्त्रं यथासम्भवं चतु- र्व्यूहमूहनीयमिति सर्वमवदातम् ॥ १२० ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे पातञ्जलदर्शनम् ॥ १५ ॥ तथा च चिकित्साशास्त्रके समान योगशास्त्रभी चार व्यूह हैं चिकित्साशास्त्रम रोग, रोगका कारण, आरोग्य और ओषध ये चार व्यूह हैं । योगशास्त्रभी संसार, संसारहेतु, मोक्ष और मोक्षोपाय इन चारोसे युक्त है दुःखमय संसार हेय हे प्रधान और पुरुषका संयोग संसारभोगरूप हेयका हेतु है उसकी अत्यन्त निवृत्ति मोक्ष है सम्यक् ज्ञान मोक्षोपाय है इस प्रकार अन्य शास्त्रोंकेभी यथासम्भव चार व्यूह जानना चाहिये ॥ १०० ॥ वार्ताद्रिमुनिसंपानप्रेम्णा गोविन्दसूरिणा । कृतोऽयमनुवादोऽस्तु श्रीनिवासमुदे सदा ॥ मासेऽस्मिन्नभसि क्षपाकगदिने पक्षेऽवलक्ष तिथौ पञ्चम्यां वसुधावसुग्रहमितेप्येकादक वत्सरे ॥ गोविन्दार्यसुधीवर स्वरचित भाषानुवाद सता पादान्तेऽपि निवेशयामि तमिमं गृह्णन्तु सन्तो मुदा ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे पातञ्जलदर्शन समाप्त हुआ ॥ १० ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहग्रन्थ समाप्त पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, | खेमराज श्रीकृष्णदास, 'लक्ष्मीवेंकटेश्वर' स्टीम् प्रेस, | " श्रीवेंकटेश्वर " स्टीम् प्रेस, कल्याण-मुबई | खेतवाडी-मुबई.