सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पातञ्जल- सांसारिक विविध दुःखहेतु होनेके कारण पुरुषको क्लेश ( उपताप ) युक्त कर देनेसे क्लेश कहे जाते हैं ॥ ४९ ॥ कर्माणि विहितप्रतिषिद्धरूपाणि ज्योतिष्टोमब्रह्महत्यादीनि विपाकाः कर्मफलानि जात्यायुर्भोगाः आफलविपाकाच्चित्त- भूमौ शेरते इत्याशया धर्माधर्मसंस्काराः तत्परिपन्थिचि- त्तवृत्तिनिरोधो योगः निरोधो नाभावमात्रमभिमतं तस्य तुच्छ- त्वेन भावरूपसंस्कारजननक्षमतासम्भवात्, किन्तु तदा- श्रयो मधुमतीमधुप्रतीकाविशोकासंस्कारशेषतान्यपदेश्यः चित्तस्यावस्थाविशेषः निरुध्यन्तेऽस्मिन् प्राणाद्याश्चित्तवृत्तय इति व्युत्पत्तेरुपपत्तेः ॥ ५० ॥ विहित ज्योतिष्टोम अग्निहोत्रादि और प्रतिषिद्ध ब्रह्महत्या कलञ्जभक्षणादि कर्म हैं ब्राह्मणत्वादि जाति, आयु भोगरूप कर्मका फल विपाक है विपाकका फलो- त्पत्तिपर्यन्त चित्तभूमिमें रहनेवाले धर्माधर्मसंस्कार आशय हैं उसके विरोधी जो चित्तकी वृत्तियां हैं उनका रोकना योग है निरोधपदमें अभावमात्र नहीं विवक्षित है क्योंकि अभाव अलीक पदार्थ होनेसे वह भावरूप संस्कारका जनक नहीं हो सकता किन्तु मधुमति मधुप्रतीकादि संज्ञक चित्तकी अवस्थाविशेष निरोध है निरोध किया जाय प्राणादि चित्तवृत्तिको जिसमें इस व्युत्पत्तिसे यही अर्थ प्रतीत होता है ॥ ५० ॥ अभ्यासवैराग्याभ्यां वृत्तिनिरोधः तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः। प्रकाशनप्रवृत्तिरूपवृत्तिरहितस्य चित्तस्य स्वरूपनिष्ठः परि- णामविशेषः स्थितिः । तन्निमित्तीकृत्य यत्नः पुनः पुनस्त- थात्वेन चेतसि निवेशनमभ्यासः। चर्मणि द्वीपिनं हन्तीति व- न्निमित्तार्थेयं सप्तमीत्युक्तं भवति ॥ ५१ ॥ ‘तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्’ इत्युक्तप्रकार निरोध दुःसाध्य समझकर उसका उपाय कहते हैं (अभ्यासेति) अभ्यास ओर वैराग्यसे उसका निरोध प्रकाशनप्रवृत्तिरहित चित्तकी स्वरूपावस्थानरूप परिणामविशेष स्थिति है उस स्थितिके लिये यत्न बारम्बार चित्तमें निवेश करना अभ्यास है। स्थितौ यहांपर सप्तमी निमित्त अर्थमें है जिस प्रकार चर्मणिद्वीपिनंहन्ति इत्यादि स्थलमें है॥ ५१ ॥