सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २८९ ) तथाच कृदन्ततया जातेश्च प्रतिषेधस्य प्रायिकत्वम् अनुशयश- ब्दस्य कृदन्तात् इनेरुपपत्तिरिति सिद्धम् ॥ ४८ ॥ शंका-सुखानुशयी और दुःखानुशयी इन दोनों सूत्रोंम जो अनुशयी शब्द है उसमें क्या ताच्छील्येऽर्थम णिनि प्रत्यय है या मत्वर्थमे इनिप्रत्यय है । प्रथम कह नहीं सकते क्योंकि सुप्यजातौ इस सूत्रमें सुपिस्यमे सुप्की अनुवृत्ति चली, आती है पुन' सुप्करन सामर्थ्यसे उपसर्गभिन्न सुप्का ग्रहण होता है अत उपस- र्गपूर्वक धातुसे णिनि नहीं होगा “पतत्यधो धाम विसारि सर्वतः” “स वभ्रुगोपजीवि- नाम् ' इत्यादि प्रसिद्ध कविप्रयोगोंकी समान कथञ्चित् णिनि मानाभी जाय तोभी वृद्धि दुर्वार होनेसे अनुशायी पद बनेगा अनुशयी न बन सकेगा । द्वितीयभी नहीं कह सकते एकाचूसे जातिवाचक कृदन्तसे, सहमन्तसे इन् और ठन् नहीं होते हैं श्ववान्, व्यघ्रवान्, दण्ड' सन्ति अस्या शालायाम् इत्या- दि इसके उदाहरण है यहा परभी अनुशयशब्द कृदन्ती अच्प्रत्ययान्त है अतः अनुशयी शब्द असाधु है ऐसा कहनाभी अनुचित है क्योंकि अभिप्रायको आप नहीं जानते हैं यह वार्तिक प्रायिक है अर्थात् सर्वत्र निषेध करताही है ऐसा नियम नहीं है अतएव वृत्तिकारने इतिशब्दको विवक्षितार्थ कहा है अतएव कार्य्यी इत्या- दिमें इनि भया अत अनुशयशब्द कृदन्त होनेपरभी इनि हो गया वस्तुत' अनुशन्द कृदन्त होनेपरभी व्याघ्रादिवत् जातिवाचक न होनेसे निषेधकी प्रवृत्तिही नहीं है अत शंका समाधान दोनों भूसा लेपनमात्र है ॥ ४८ ॥ पूर्वजन्मानुभूतमरणदुःखानुभववासनावलात् सर्वस्य प्राणभृ- न्मात्रस्याकृमेश च विदुषः सञ्जायमान शरीरविषयादेर्मम वियोगो मा भूदिति प्रत्यह निमित्त विना प्रवर्त्तमानोभयरू- पोऽभिनिवेश पञ्चम क्लेश । 'मा च भूवं हि भूयासमिति प्रार्थनाया प्रत्यात्ममनुभवसिद्धत्वात् । तदाह 'स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेश' इति । ते चाविद्यादय पञ्च सांसारिकविविधदुःखोपहारहेतुत्वेन पुरुष क्लिश्नन्तीति क्लेशा- प्रसिद्धाः ॥ ४९ ॥ पूर्वजन्ममें अनुभूत मरणदुःखानुभववासनावश कृमिसे लेकर बडे ज्ञानविर्य्य ट समस्त आर विषयादि प्राणियाको हमारे शरीरका नाश न हो इस प्रकार विन निमित्तके उत्पन्न भयरू। नाम अभिनिवेश है यही पाँचों क्लेश हैं उक्त अविद्यादिन १९