भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 307

( ३०० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- गतिनिरोध होताही है भीतरके वायुका बाहर निकालना रेचक प्राणायाम हे जिसको प्रश्वास कहा बाह्यवायुको भीतर लेजाना पूरक हे जिसको श्वास कहा भीतर रोकना कुम्भक है जिस प्रकार घटमें जलको निश्चलरूपसे रोका जाता है उसी प्रकार प्राण वायुको निश्चल किया जाता है अत' सर्वस्थलमें श्वासप्रश्वासगतिनिरोध होनेसे शंका कलंकका लेशभी नहीं है अतएव कहा है कि तादृश कुम्भक होनेपर श्वास प्रश्वासकी गतिनिरोधरूप प्राणायाम होता है ॥ ७९ ॥ स च वायुः सूर्योदयमारभ्य सार्द्धघटिकाद्वयं घटीयन्त्रस्थित- घटभ्रमणन्यायेन एकैकस्या नाड्यां भवति । एवं सत्यहर्निशं श्वासप्रश्वासयो षट्शताधिकैकविंशतिसहस्राणि जायन्ते अत एवोक्तं मन्त्रसमर्पणरहस्यवेदिभिरजपामन्त्रसमर्पणे । “षट्शतानि गणेशाय षट्सहस्रं स्वयम्भुवे । विष्णवे षट्सह- स्रं च षट्सहस्रं पिनाकिने ॥ सहस्रमेकं गुरवे सहस्रं परमात्मने । सहस्रमात्मने चैवमर्पयामि कृतं जपम् ॥” इति ॥ ८० ॥ वह वायु सूर्योदयसे लेकर ढाई घडीतक घटीयन्त्रके घडेकी समान इडा पिंगला और सुषुम्ना प्रत्येक नाडीमें घूमता है इस प्रकार दिनरात्रिमें श्वास प्रश्वासकी संख्या २१६०० हो जाती है अतएव मन्त्रसमर्पणवेत्ताओने अजपामन्त्र समर्पणमें कहा है किये हुए जपमेसे ६०० गणेशजीको, ६००० ब्रह्माजीको, ६००० विष्णुभगवान्को, ६००० महादेवजीको १००० गुरुको १००० परमात्माको और १००० अपने आत्माको अर्पण करता हू इति ॥ ८० ॥ तथा नाडीसञ्चरणदशायां वायोः सञ्चरणे पृथिव्यादीनि तत्त्वानि वर्णविशेषवशात् पुरुषार्थाभिलाषुकैः पुरुषैरवगन्त- व्यानि । तदुक्तमभियुक्तै - “सार्द्धं घटीद्वयं नाडीरेकैकोद- यात् वहेत् । आरघट्टघटीभ्रान्तिन्यायो नाड्यो पुन पुन ॥ ८१ ॥ नाडियोंके घूमते समय वायुका सञ्चरण होनेसे नीलपीतादि वर्णविशेषोपलक्षित पृथिव्यादितत्त्वभी पुरुषार्थ चाहनेवालोंको अवश्य ज्ञातव्य हे । अभियुक्तोने कहा है घटीयन्त्रस्य घटके समान सूर्योदयसे ढाई घटातक एक एक नाडी चलती है ॥ ८१ ॥ शतानि तस्य जायन्ते नि श्वासोच्छ्वासयोर्नृषु । रसषट्कादिके सङ्ख्याहोरात्रे सकले पुन ॥ षट्त्रिंशद्गणर्णाना या वेला भगने