भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतं । ( २९७ ) कि लक्षणारोपितेति अर्थात् शक्याव्यवहित लक्ष्यार्थ विषयक होनेमे शब्दमें आरो- पितमात्र है वस्तुतः अर्थवृत्तिही हे प्रयोजनवती लक्षणाका उदाहरण गङ्गायांघोषः है यहां शैत्यपावनत्वादि प्रयोजन हे ॥ ७२ ॥ प्रयोजनलक्षणा तु षड्विधा उपादानलक्षणा लक्षणलक्षणा गौणसारोपा गौणसाध्यवसाना शुद्धसारोपा शुद्धसाध्यवसाना चेति । कुन्ताः प्रविशन्ति मञ्चा क्रोशन्ति गौर्वाहीकः गौरयं आयुर्घृतं आयुरेवेदमिति यथाक्रममुदाहरणानि द्रष्टव्यानि ॥७३॥ लक्षणा दो प्रकारकी है. शुद्ध ओर गौणी शुद्धमेंभी उपादानलक्षणा आर लक्षण- लक्षणारूप दो भेद हैं उन दोनोंमेंभी सारोप, ओर साध्यवसानरूप दो भेद हैं अ- र्थात् उपादानलक्षणा सारोपा, उपादानलक्षणा साध्यवसाना, लक्षणलक्षणा सारोपा, और लक्षणलक्षणासाध्यवसाना भेदसं शुद्धलक्षणा चार प्रकारकी है गोणीभी सारोप ओर साध्यवसान भेदमे दो प्रकार है इस प्रकार लक्षणा ६ प्रकार है कुन्ताः प्रवि- शन्ति मञ्चाः क्रोशन्ति, गोर्वाहीकः, गौरयम्, आयुर्धृतम्, आयुरेवेदम् इत्यादि उदाहरण हैं ॥ ७३ ॥ तदुक्तम्- "स्वसिद्धये पराक्षेपः परार्थं स्वसमर्पणम् । उपादानं लक्षणं चेत्युक्ता शुद्धैव सा द्विधा ॥ सारोपान्या तु यत्रोक्तौ विषयी विष- यस्तथा । विषय्यन्तःकृतेऽन्यस्मिन् सा स्यात् साध्यवसा- निका ॥ भेदाविमौ च सादृश्यात् सम्बन्धान्तरतस्तथा । गौणौ शुद्धौ च विज्ञेयौ लक्षणा तेन षड्विधा ॥" इति ॥ तदलं काव्यमीमांसामर्मनिर्मन्थनेन ॥ ७४ ॥ ( तदुक्तमिति ) वाक्यार्थमें स्वार्थका अन्वयप्रवेश सिद्धिके लिये पराक्षेप परका लक्षण अर्थात् स्वार्थको न त्यागकर परार्थलक्षण उपादान लक्षण है यथा "कुन्ताः प्रविशन्ति" यहापर कुन्तको वाक्यार्थमें अन्वयसिद्धिके लिये कुन्तधारी पुरुषका आक्षेप होता है इसीको अजहत्स्वार्था लक्षणा कहते हैं। परार्थमिति । परार्थका अन्वय- सिद्धिके लिये स्वार्थका त्याग लक्षणलक्षणा है यथा "गङ्गायांघोषः " घोषपदार्थके अन्वयसिद्धिके लिये गंगापद स्वार्थको त्यागकर तीरूप अर्थको लक्षित करता है यह दोनों भेद शुद्धके हैं सारोपान्येति अन्य अर्थात् गोणी सारोप ओर साध्यव- सान भेदसे दो प्रकार है विषयी आरोप्यमाण गवादि ओर विषय आरोपके वाही- कादि दोनोके जहाँपर भेदरूपसे सामानाधिकरण्यका प्रतिपादन हो वह सारोप हे यथा गोर्वाहीक इत्यादि आरोप्यमाण गवादि अन्य आरोपविषयमन्तः निगीर्ण