भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २९८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पातञ्जल-

हो अर्थात् भेदसे प्रतीयमान न हो वह साध्यवसाना है उक्त दोनो भेद सादृश्यस- म्बन्धसे हो तो गौणी और अन्यसम्बन्धसे हो तो शुद्धा होती है सादृश्यमूलक सारोपका उदाहरण गौर्वाहीक है साध्यवसानका उदाहरण गौरयम् है सम्बन्धन्तर- से शुद्धसारोपका उदाहरण आयुर्घृतम् है साध्यवसानका उदाहरण आयुर्वेवेदम् है यहापर कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध है गौणसारोपमे भेद होते हुएभी अभेद प्रतीति और साध्यवसानमें सर्वथा अभेदप्रतीति प्रयोजन है शुद्ध सारोपम अन्य वैलक्षण्यसे कार्यकारित्व और साध्यवसानमें अव्यभिचारण कार्यकारत्व फल है ॥ ७४ ॥ स च योगो यमादिभेदवशादष्टांग इति निर्दिष्टः । तत्र यमा अहिंसादय । तदाह पतञ्जलि 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्या- परिग्रहा यमा' इति । नियमाः शौचादयः । तदप्याह 'शौच- सन्तोषतप स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः' इति ॥ ७५ ॥ उक्त योग यमनियमादिभेदसे अष्टाङ्ग है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ( चोरी न करना ) ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह ( दान ) न लेना, यम है। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वरप्रणिधान नियम है यह विष्णुपुराणमेंभी कहा है ॥ ७५ ॥ एते च यमनियमा विष्णुपुराणे दर्शिताः-"ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् । सेवेत योगी निष्कामो योग्यतां स्वं मनो नयन् ॥ स्वाध्यायशौचसन्तोषतपांसि नियतात्मवान् । कुर्वीत ब्रह्मणि पर परस्मिन् प्रवणं मन ॥ एते यमा पनि- यमा पञ्च पञ्च प्रकीर्त्तिता । विशिष्टफलदा कामे निष्का- माना विमुक्तिदाः ॥" इति ॥ ७६ ॥ निष्कामयोगी चित्तकी योग्यता प्राप्त करते हुए ब्रह्मचर्यादिको सेवन करे वशी- कृतेन्द्रिय होकर स्वाध्यायादि कर परब्रह्ममें मनको सदा आसक्त ( ईश्वरप्रणिधान ) करे उक्त पाँच यम और पाँच नियम सकाम योगीको अभीष्ट फल देनेवाले हैं और निष्कामयोगीके लिये मोक्ष देनेवाले हैं ॥ ७६ ॥ स्थिरसुखमासनं पद्मासनभद्रासनवीरासनस्वस्तिकासनदण्ड- कासनसोपाश्रयपर्यङ्कक्रौञ्चनिषदनोष्ट्रनिषदनसमसंस्थासम्भेद्रा- दशविधम् । "पादाङ्गुष्ठौ निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु । ऊरूरूपरि विप्रेन्द्र ! कृत्वा पादतले उभे । पद्मासन भवेदेतत्