सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रतोंसे शरीरको शोषण करना उनमें श्रेष्ठ तप है। प्रणव गायत्री वेदोपनिषदादिका अध्ययन स्वाध्याय है । वैदिक तान्त्रिक भेदसे मन्त्र दो प्रकार है वैदिक मन्त्रभी दो प्रकार है एक प्रगीत दूसरा अप्रगीत है । प्रगीत साम है जिसको गान किया जाता है छन्दोबद्ध और उससे विलक्षण भेदमे अप्रगीतभी दो प्रकार है प्रथम ऋक् है जिसमें अर्थवश पादव्यवस्था होती है दूसरा यजु है इसमें पादव्यवस्था नहीं है ॥ ५३ ॥ तन्त्रेषु कामिककारणप्रपञ्चाद्यागमेषु ये ये वर्णितास्ते तान्त्रि- का ॥ ते पुनर्मन्त्रास्त्रिविधा स्त्रीपुन्नपुंसकभेदात्तत्राह-“स्त्री- पुंनपुंसकत्वेन त्रिविधा मन्त्रजातयः । स्त्रीमन्त्रा वह्निजायान्ता नमोऽन्ताः स्युर्नपुंसका । शेषाः पुमांसस्ते शस्ता सिद्धा वश्यादिकर्मणि ॥” इति ॥ ५४ ॥ कामिक और कारण प्रपञ्चाद्यागममें जो प्रतिपादित मन्त्र हे वह तान्त्रिक हे । स्त्री पुरुष नपुंसकभेदसे वे मन्त्र तीन प्रकार हैं । स्वाहान्त मन्त्र स्त्री मन्त्र है नम पद जिसके अन्तमें हो वह नपुंसक मन्त्र है । अवशिष्ट पुरुष मन्त्र हैं । वशीकरणादि कार्योंमें पुमन्त्र प्रशस्त हैं ॥ ५४ ॥ स्नापनादिसंस्काराभावेऽपि निरस्तसमस्तदोषत्वेन सिद्धिहेतु- त्वात् सिद्धत्वम् । स च संस्कारो दशविध कथितः शारदा- तिलके ॥ “मन्त्राणा दश कथ्यन्ते संस्कारा सिद्धिदायिन । निर्दोषतां प्रयान्त्याशु ते मन्त्राः साधु संस्कृताः ॥ ५५ ॥ अभिषेकादि संस्कार न होनेपरभी निर्दोष होनेके कारण सिद्ध हेतु होनेसे सिद्ध कहाते हैं । मन्त्रोंके सिद्धि प्रद दश प्रकारके संस्कारोंको कहते हैं जिन संस्कारोंसे संस्कृत मन्त्र शीघ्रही निर्दुष्ट हो जाते हैं ॥ ५५ ॥ जननं जीवनञ्चैव ताडनं बोधनं तथा । अभिषेकोऽथ विमली- करणाप्यायने पुनः ॥ तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्रसत्क्रिया ॥ मन्त्राणां मातृकावर्णादुद्धारो जननं स्मृतम् ॥ ५६ ॥ दशविध संस्कार इस प्रकार हैं । १ जनन २ जीवन ३ ताडन ४ बोधन ५ अभि- षेक ६ विमलीकरण ७ आप्यायन (पुष्टि) ८ तर्पण ९ दीपन और १० गुप्ति यही दश संस्कार हैं मन्त्रोंको मातृका वर्णोंसे उद्धार करनेका नाम जनन है ॥५६॥