भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २९५ ) क्रियाफलका त्यागभी भक्तिविशेषरूप ईश्वरप्रणिधानही है । अतएव भगवद्गीता- में कहा है हे अर्जुन ! तुमको कर्महीमें अधिकार है फलमे कदाचित् अधिकार नहीं कर्म और फलका हेतुभी न हो अर्थात् फलाभिलाषासे कर्म न करो कर्मके त्यागमें भी तुम्हारी रुचि न हो ॥ ६९ ॥ फलाभिसन्धेरुपघातकत्वमभिहितं भगवद्भिर्नीलकण्ठभारती- श्रीचरणै । “अपि प्रयत्नसम्पन्नं कामेनोपहतं तपः । न तुष्टये महेशस्य श्वाल्लीढमिव पायसम् ॥” इति ॥ ७० ॥ नीलकण्ठभारतीजीने कहा है-अत्यन्त प्रयत्नसे किया हुआभी फलकामनायुक्त तप ईश्वरकी प्रीतिकारक नहीं होता है जिस प्रकार कुकरका उच्छिष्ट पायस किसीके प्रतिकारक नहीं होता है ॥ ७० ॥ सा च तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानात्मिका क्रिया योगसाधन- त्वाद्योग इति । शुद्धसारोपलक्षणावृत्त्याश्रयणेन निरूप्यते यथायुर्धृतमिति । शुद्धसारोपलक्षणा नाम लक्षणाप्रभेदः मुख्यार्थबाधतद्योगाभ्यामर्थान्तरप्रतिपादनं लक्षणा । सा द्विविधा रूढिमूला प्रयोजनमूला च तदुक्तं । काव्यप्रकाशे । “मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया ॥” इति । तच्छब्देन लक्ष्यत इत्याख्याते गुणीभूत प्रतिपादनमात्र परा- मृश्यते । सा लक्षणेति प्रतिनिर्दिश्यमानापेक्षया तच्छब्दस्य स्त्रीलिङ्गत्वोपपत्तिः तदुक्तं कैयटै । निर्दिश्यमानप्रतिनिर्दिश्य- मानयोरैक्यमापादयन्ति सर्वनामानि पर्यायेण तत्तल्लिङ्गमुपाद- दत इति ॥ ७१ ॥ तप, ईश्वर प्रणिधान स्वाध्यायरूप क्रिया योग साधन होनेके कारण शुद्धसारो पलक्षणासे योग कहाता है जैसे आयुका साधक घृतमें आयुर्घृतम् इत्यादि व्याहार होता है तथाहि शब्दका मुख्यार्थ ( शक्तिसे उपस्थितार्थ ) का बाध होनेपर मुख्या- र्थयुक्त अर्थान्तर बोधनका नाम लक्षणा है । वह रूढि ओर प्रयोजनवती भेदसे दो प्रकार हे । इस विषयमें काव्यप्रकाशकारकी सम्मति कहते हैं मुख्यार्थ बाध इति रूढिका अर्थ प्रसिद्ध है प्रयोजन व्यङ्ग्यार्थ प्रति...

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