भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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(२८२) सर्वदर्शनसंग्रहः । [पातञ्जल- क्षिप्ताद्यवस्थामे क्लेशप्रणाशकत्वका असम्भव हे ओर केवल्यका विरोधी भी हे तत्तद्वि- षयमें विचलित अस्थिर चित्तको क्षिप्त कहते हैं तमोगुणके समुद्भव मग्न निद्रावृत्ति चित्तको मूढ कहते हैं क्षिप्तसेभी अधिक चञ्चल चित्तको विक्षिप्त कहते हैं अस्थिर- स्वभाव चित्तकोभी कदाचित् विषयस्थैर्यवश उत्पन्न स्थैर्यको विक्षेप कहते हैं । अ- स्थिरत्व स्वाभाविक अथवा व्याध्यादि खेदसे उत्पन्न होता है अतएव व्याध्यादिके चित्तविक्षेप और योगका अन्तराय कहा है ॥ ३५ ॥ तत्र दोषत्रयवैषम्यनिमित्तो ज्वरादिव्याधि , चित्तस्याकर्म- ण्यत्वं स्त्यानं विरुद्धकोटिद्वयावगाहि ज्ञानं संशयः, समा- धिसाधनानामभावनं प्रमादः, शरीरवाक्चित्तगुरुत्वादप्रवृत्ति- रालस्यं विषयाभिलाषोऽविरति अतस्मिंस्तद्बुद्धिर्भ्रान्तिदर्शनं कुतश्चिन्निमित्तात् समाधिभूमेरलाभोऽलब्धभूमिकत्वं लब्धा- यामपि तस्यां चित्तस्याप्रतिष्ठा अनवस्थितत्वमित्यर्थः । तस्मान्न वृत्तिनिरोधो योगपक्षनिक्षेपमर्हति इति चेन्मैवं वोच हेयभूतक्षिप्ताद्यवस्थात्रये वृत्तिविरोधस्य हेयत्वसम्भवेऽप्युपादे- ययोरेकाग्रनिरुद्धावस्थयोर्वृत्तिनिरोधस्य योगत्वसम्भवात् एकतानं चित्तमेकाग्रमुच्यते निरुद्धसकलवृत्तिकं संस्कारमात्र- शेषं चित्तं निरुद्धमिति भण्यते ॥ ३६ ॥ वात, पित्त, श्लेष्मके वैषम्यसे उत्पन्न ज्वरादि व्याधि हे चित्तका अकर्मण्यता ( सुस्ति ) स्त्यान है । स्थाणु है या पुरुष इत्यादि विरुद्धकोटि ज्ञानको संशय कहते हैं । समाधिके साधनोंका चिन्तन न करना प्रमाद है मनोवाक्कायका गुरुतासे अप्रवृत्ति आलस्य है । विषयका तृष्णा अविरति है । अन्य वस्तुमें अन्य बुद्धि भ्रान्ति है । किसी कारणसे समाधिकी काष्ठा न प्राप्त होना अलब्धभूमिकत्व हे । समाधि भूमि प्राप्त होनेपरभी चित्तकी अप्रतिष्ठा अनवस्थिति है अत वृत्तिनिरोधको योग नहीं कह सकते ऐसे नही कह सकते क्योंकि हेयभूत क्षिप्तादि अवस्थात्रयमें वृत्तिविरोध हेय होनेपरभी उपादेयभूत एकाग्र और विरुद्धावस्थामें वृत्तिनिरोध योग हो सकता है चित्तका एक रूप रहना एकाग्र है समस्त वृत्ति निरुद्ध होनेसे मस्कार मात्र चित्तको निरुद्ध कहते हैं ॥ ३६ ॥ स च समाधिर्द्विविध सम्प्रज्ञातासम्प्रज्ञातभेदात् । तत्रैकाग्र चेतसि य प्रमाणादिवृत्तीनां बाह्यविषयाणां निरोध स सम्प्र-