सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १९ ) मंकरे । न चैष वर्त्तमानार्थक्रियाकरणकाले वृत्तवर्त्तिष्यमाणे अर्थक्रिये करोतीति तद्विपर्ययाच्च ॥ १५ ॥ शङ्का-अक्षणिक (स्थिरको) अर्थक्रियाकारित्व क्यों नहीं हो सकता है । उत्तर- स्थिर पदार्थ वर्त्तमानकालमें जो कार्य करता है उस कालमें अतीत और अनागत कार्य करनेका उस पदार्थको सामर्थ्य है या नहीं ? यदि है तो उसका त्याग करना असम्भव होगा अर्थात् वर्त्तमान अर्थक्रियाकरण समयमें ही भूत भविष्य अर्थक्रिया भी होने लगेगी परन्तु ऐसा होता नहीं । यह नियम है कि जो वस्तु जिस समय जिस कार्यके करनेमें समर्थ है वह उसकालमें उसकार्यको करता है जिस प्रकार सामग्री (दण्ड चक्रादि) अपना कार्य (घटादि) को उत्पन्न करते हैं यदि कहो समर्थ नहीं तो पुनः कदापि उस कार्यको नहीं कर सकेगा, सामर्थ्यके आधीन ही कार्य होता है ॥ जो जिस समयमें जिस कार्यको नहीं कर सकता । वह उसमें उस समय असमर्थ है जिस प्रकार पाषाणखण्ड अङ्कुरको नहीं कर सकता यह भी (स्थायित्वेनाभिमत) वर्तमान अर्थक्रियाके उत्पा- दन समयमें अतीतानागत अर्थक्रिया (प्रयोजनीभूतकार्य) नहीं करता है ऐसा अन्वय व्यतिरेक दोनों होते हैं ॥ १५ ॥ ननु क्रमवत् सहकारिलाभात् स्थायिनः अतीतानागतयो- क्रमेण क्रमणमुपपद्यते इति चेत् तत्रेदं भवान् पृष्टो व्याचष्टां सह- कारिणः किं भावस्योपकुर्व्वन्ति न वा ? न चेत् नापेक्षणीयास्ते अकिञ्चित्कुर्व्वतां तेषां तादर्थ्यायोगात् । उपकारकत्वपक्षे सोऽ- यमुपकारः किं भावादभिद्यते न वा ? भेदपक्षे आगन्तुकस्यैव तस्य कारणत्वं स्यात् न भावस्याक्षणिकस्य आगन्तुकातिशया- न्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् कार्य्यस्य ॥ १६ ॥ यदि कहो सहकारी कारणकी उपलब्धि क्रमसे होती है अतः वस्तु स्थिर होनेपर भी क्रमसे ही अर्थक्रियाका सम्पादन करेगी क्योंकि सहकारी कारणके विना कार्य नहीं हो सकता । प्रथम इसका उत्तर दो क्या सहकारी कारण भाव अर्थात् प्रधानकारणका कोई उपकार करता है या नहीं? उपकार नहीं करता हो तो? अकिञ्चित्कर होनेसे उसकी अपेक्षा ही व्यर्थ होगी । यदि कहो उपकार करता है तो क्या वह उपकार (शक्ति) स्थिर पदार्थसे भिन्न है या अभिन्न ? भिन्न मानो तो सहकारीसे आया हुआ उपकार (शक्ति) अर्थ क्रियाका कारण हुआ न कि अक्षणिक पदार्थ कारण हुआ आगन्तुक अतिशयके रहनेसे कार्य होता है उसके न रहनेसे नहीं होता है इसप्रकार आगन्तुक अतिशयके अन्वय व्यतिरेकाधीन कार्य हुआ ॥ १६ ॥