सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध धूम भी नहीं रहता सत्त्वका व्यापक क्रम और अक्रम है यह क्षणिक ही म सम्भव है अतः व्यापक क्रमाक्रम अक्षणिकसे (स्थिरसे) व्यावृत होनेसे उसका व्याप्य सत्त्व भी अक्ष- णिकसे व्यावृत होता है। अर्थक्रियाकारित्वरूप सत्त्व क्रम (पर्याय) अक्रम (युग पत्) से व्याप्त है अर्थात् क्रमाक्रमसत्त्वका व्यापक है। अर्थ क्रियाकारित्व (किञ्चि- त्करत्व) के लिये क्रम अक्रम दोनोंको छोडकर तीसरा मार्ग ही नहीं। क्रमके विरुद्ध है अक्रम और अक्रमके विरुद्ध है क्रम इन दोनोंसे परस्परविरुद्ध प्रकारान्तर नहीं हो सकता। क्रमाक्रम जो विरुद्ध है उसका एकत्र भी नहीं हो सकता। क्योंकि यह वचनसे ही विरुद्ध है उक्तयुक्तिसे व्याहति भी स्पष्ट है ॥ १३ ॥ तौ च क्रमाक्रमौ स्थायिनः सकाशाद्व्यावर्त्तमानौ अर्थक्रिया- मपि व्यावर्तयन्तौ क्षणिकत्वपक्ष एव सत्त्वं व्यवस्थापयत इति सिद्धम् ॥ १४ ॥ उक्त क्रमाक्रम अक्षणिकमें असम्भव होनेसे स्थायीसे स्वयं व्यावृत होते हुए व्याप्य भूत अर्थक्रियाको भी व्यावृत्ति कराकर क्षणिकपक्षमें सत्त्वको व्यवस्थित करते हैं ॥१४॥ नन्वक्षणिकस्यार्थक्रियाकारित्वं किं न स्यादिति चेत् तदयुक्तं विकल्पासहत्वात् । तथा हि-वर्त्तमानार्थक्रियाकरणकाले अती- तानागतयो * किमर्थकियोः स्थायिनः सामर्थ्यमस्ति नो वा ? आद्ये तयोर्निराकरणप्रसङ्गः, समर्थस्य क्षेपायोगात्। यत् यदा यत्करणसमर्थं तत् तदा तत् करोत्येव यथा सामग्री स्वकार्ये समर्थश्चायं भाव इति प्रसङ्गानुमानाच्च । द्वितीयेऽपि कदापि न कुर्यात् सामर्थ्यमात्रानुबन्धित्वादर्थक्रियाकारित्वस्य यत् यदा यन्न करोति तत् तदा तत्रासमर्थं यथा हि शिलाशकल-
- यहां पर तात्पर्य यह है कि कुसूल (बखार) स्थबीजसे अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता, क्षेत्रस्थ बीजसे उत्त होता है । अब दोनों स्थानका बीज एक होता तो कुसूलमें भी अङ्कुर अवश्य उत्पन्न होता परन्तु ऐसा ही नहीं अतः क्षेत्रस्थावस्थामें पूर्व (कुसूलस्थ) बीज नष्ट होकर बीजान्तर उत्पन्न होगया ऐसा अवश्य मानना होगा एव-घटादिक भी वर्तमान क्षणमें अतीत अनागत काय्र्यक्रियाको नहीं करता अतः तीत अनागत क्ष क्रिया सामर्थ्य उसमें नहीं है ऐसा कहना होगा यह क्षणिकपक्ष माने बिना नहीं हो सकता क्योंकि बौद्ध मत में कार्य्य और सत्ता सब एक है सामर्थ्याभावमें सत्ताका भी अभाव है युगपत् सर्वक्रिया उत्पादन पक्षमें १ ला क्षणमें समस्त क्रिया करनेसे "कृतस्य करणमाम्नीति' न्यायसे द्वि-तीयादिक्षणमें अर्थक्रियाकारित्व का गन्ध भी नहीं रहेगा। एक क्षणिक क्षणमात्रवृत्ति है अर्थात् अनेक क्षणमें शक्ति होकर काय्र्यवृत्ति हो