भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १७ ) सर्व्वं क्षणिकं क्षणिकं दुःखं दुखं स्वलक्षणं स्वलक्षणं शून्यं शून्यमिति भावनाचतुष्टयमुपदिष्टं द्रष्टव्यम् ॥ ११ ॥ "भावनाका आकार" समस्त वस्तु क्षणिक है क्षणिक हैं-१-समस्त वस्तु दुःखात्मक हैं-२- क्षणिक होनेके कारण अन्यवस्तुका सादृश्य न होसकनेसे स्वलक्षण-स्वलक्षण -३- समस्त वस्तु शून्य है शून्य है ४ यही भावनाचतुष्टय है ॥ ११ ॥ तत्र क्षणिकत्वं नीलादिक्षणानां सत्त्वेनानुमातव्यं यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरपटल सन्तश्चामी भावा इति ॥ १२ ॥ क्षणिकत्व साधन युक्ति कहते हैं "तत्रेत्यादि" नीलादिवस्तुके क्षणिकत्वका सत्वरूप हेतुसे अनुमान किया जाता है *। क्षणिकत्व साधक अनुमान-यत् सत् (जो सत् है) तत् क्षणिकम् ( वह क्षणिक है ) यथा जलधर पटल ( जिसप्रकार मेघमडल नीलादि भाव भी सत् है अतः वह भी क्षणिक है-जहा जहा सत्व है वहा सर्वत्र क्षणिकत्व है यही व्याप्ति हुई बौद्धमतमें अनुमानके उदाहरण उपनय दो अवयव हैं। जलधरपटल पर्यन्त व्याप्तिप्रति पादक उदाहरण है, सन्तश्चामीभावाः पक्षधर्मता प्रतिपादक उपनय है ॥ १२ ॥ न चायमसिद्धो हेतुः, अर्थक्रियाकारित्वलक्षणस्य सत्त्वस्य नीला- दिक्षणानां प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । व्यापकव्यावृत्त्या व्याप्यव्यावृत्ति- न्यायेन व्यापकक्रमाक्रमव्यावृत्तावक्षणिकत् सत्त्वाव्यावृत्तेः सिद्धत्वाच्च । तच्चार्थक्रियाकारित्व क्रमाक्रमाभ्यां व्याप्तं न च क्रमाक्रमाभ्यामन्यः प्रकारः समस्ति । "परस्परविरोधे हि न प्रकारन्तरस्थिति । नैकतापि विरुद्धानामुक्तमात्रविरोधतः" इति न्यायेन व्याघातस्योद्भटत्वात् ॥ १३ ॥ यदि कहो हेतुका पक्षवृत्तित्त्व न होनेसे आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभास होता है सो यहा पर भी घटादि पक्षमें सत्वरूप हेतुका आश्रयासिद्ध होगा, यह भी नहीं क्यों कि अर्थ- क्रियाकारित्व ही सत्व है अर्थ प्रयोजन तद्रूपा क्रिया अर्थक्रिया प्रयोजनीक्रियाकारि त्व किञ्चित्करत्वमिति यावत् एतादृशसत्व नीलादि क्षणमें प्रत्यक्ष सिद्ध है। व्यापकके न रहनेसे व्याप्य भी नही रहता ऐसा नियम है जैसे वह्निके न रहनेसे

  • कोई कोई ऐसे भी कहते हैं कि बौद्धके मतमें काल अतिरिक्त पदाथ नहीं है क्षण्यते दीस्यते इस व्युत्प त्तिस-लब्ध जो क्षण है उसके साथ नीलादिको कर्मधारय समास करनेसे नीलादिरूपक्षण यही अर्थ होता है क्षणिक-व्यवहार राहो शिर नीलापुनरा शरीर इत्यादिद्वत् है। "अविरुद्ध है या नहीं इसका' निर्णय उद्धीके ग्रन्थसे ही हो सकता है। २