भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

( १६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध- ह अर्थात् प्रमाणाभास है। इस भाँति कहकर स्वयं स्वभावानुमानको स्वीकार कर लिया। एव अन्यदीय विरुद्धाभिप्राय वचनरूप हेतुसे अवगत होता है, इस प्रकार कहकर कार्यमे कारणका अनुमान भी मानलिया, अनुपलब्धि हेतुसे घटादि वस्तुका प्रतिषेध करनेसे अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमानको भी स्वीकार ही किया । उक्त तीनो अनुमानोको सङ्ग्रह करके कहते हैं। 'तथा चोक्तमित्यादि'। प्रमाणान्तर सामान्यपरसे प्रलय प्रमाद तदभाव व्यवस्थापनरूप स्वभावानुमान “अन्यधिय. गते” इन शब्दोस् कार्यलिङ्गरूक अनुमान् अवशिष्टसे अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमान हो गये हैं ॥ ८ ॥ ते च बौद्धाश्चतुर्विधया भावनया परमपुरुषार्थं कथयन्ति । ते च माध्यमिकयोगाचारसौत्रान्तिकवैभाषिकसञ्ज्ञाभिः प्रसिद्धाः बौद्धा यथाक्रमं सर्व्वशून्यत्वबाह्यशून्यत्वबाह्यार्थानुमेयत्वबाह्या- र्थप्रत्यक्षत्ववादानातिष्ठन्ते ॥ ९ ॥ दूरसे नदी आदि जल्को देखकर यह जल है, ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण है अन्यत्र दृष्ट जलके सजातीय होनेसे एव मृगतृष्णादिमे जल प्रत्यक्षज्ञान अप्रमाण है अर्थात् प्रमाणाभास है। इस भाँति कहकर स्वयं स्वभावानुमानको स्वीकार किया यहा तक बौद्धोने चार्वाक मतको सयुक्ति खण्डन किया । आगे स्वसिद्धान्त कहते है बौद्ध वक्ष्य माण चारप्रकारकी भावनासे ही परम पुरुषार्थ मानते हे ये माध्यमिक योगाचार, सौत्रा न्तिक और वैभाषिक भेदसे चार प्रसिद्ध है । माध्यमिक बाह्याभ्यन्तर समस्त वस्तुको शून्य मानते है । योगाचार बाह्यवस्तुको शून्य मानते है । सौत्रान्तिक बाह्यवस्तुको अनुमेय मानते हैं और वैभाषिक लोग बाह्यवस्तुको प्रत्यक्ष कहते हैं। मा यमिकादिसञ्ज्ञा का निमित्त आगे चलकर स्पष्ट होगा ॥ ९ ॥ यद्यपि भगवान् बुद्ध एक एव बोधयिता तथापि बोद्धव्यानां बुद्धिभेदाच्चातुर्विध्यं यथा तोऽस्तमर्क इत्युक्ते जारचौरानूचा-