भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १५ ) दोनों वस्तुए अत्यन्त अभिन्न होनेपर तादात्म्य असम्भव है। क्यो कि अत्यन्त अभेद में पर्याय होता है पर्यायवाचक अनेक शब्दोंका एक साथ प्रयोग नहीं होता है यथा घट कलश इत्यादि अत्यन्त भेदमें भी तादात्म्य नहीं होता कोई भी अश्व महिप को तादात्म्य नहीं कहते अतः भेदाभेद समनियत तादात्म्य है तथाच कार्य रूपसे भेद और कारण रूपसे अभेद होनेपर कार्य वस्तु कारणका अनुमान करता है यह सिद्ध हुआ ॥ ६ ॥ यदि कश्चित् प्रामाण्यमनुमानस्य नांगीकुर्यात् तं प्रति ब्रूयात् अनुमानप्रमाणं न भवतीत्येतावन्मात्रमुच्यते तत्र न किञ्चन साधनमुपन्यस्यते उपन्यस्यते वा । न प्रथम॰, एकाकिनी प्रति- ज्ञा हि प्रतिज्ञातं न साधयेदिति न्यायात्। नापि चरमः, अनुमानं प्रमाणं न भवतीति ब्रुवाणेन त्वया (अशिरस्क) साधनवचनस्यो_ पन्यासे मम माता वन्ध्येतिवद् व्याघातापातात् ॥ ७ ॥ यदि कोई अनुमान प्रमाण न माने तो उससे पूछना चाहिये क्या अनुमान प्रमाण नहीं इतना ही कहते हो या कुछ हेतुका भी उपन्यास करते हो, ऐसा नियम है केवल प्रतिज्ञा मात्रसे वस्तुसिद्धि नहीं होती है पर्वतमें अग्नि है इस प्रतिज्ञामात्र से कोई सन्तुष्ट न होगा धूमादि हेतुको भी दिखाना पडेगा अतः प्रथम विकल्प असम्भव है । द्वितीय पक्षमें अनुमान अप्रमाण है प्रमितिकरणतावच्छेदकधर्मशून्य होनेसे इत्यादि हेतु और साध्य दिखाकर अनुमान ही करोगे तब तो अनुमानको अप्रामाण्य साधनेमें भी अनुमान ही प्रमाण होनेसे अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वदतो व्याघात होगा ॥ ७ ॥ किञ्चप्रमाणतदाभासव्यवस्थापनंतत्समानजातीयत्वादितिवदता भवतैव स्वीकृतं स्वभावानुमानम् । परगता विप्रतिपत्तिस्तु वच- नलिङ्गेनेति ब्रुवता कार्यलिङ्गमनुमानम् अनुपलब्ध्या कश्चिदर्थं प्रतिषेधयतानुपलब्धिलिङ्गमनुमानम् । तथा चोक्तं तथागतैः- प्रमाणान्तरसामान्यस्थितिरन्यधियो गतेः । प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचिदिति ॥ पराक्रान्तञ्चात्र सूरिभिरिति ग्रन्थभूयस्त्वभयादुपरम्यते॥८॥ 'किञ्चेति'-दूरसे नदी आदिमें जलको देखकर यह जल है ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण । अन्यत्र दृष्ट जलके सजातीय होनेसे एवं मृगतृष्णादिमे जल प्रत्यक्षज्ञान अप्रमाण

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