सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध नकारणनाश) के पश्चात् उपलब्ध नहीं होता, इत्यादि क्रम है उत्पत्तिके पूर्व अनुपलब्ध कारणोपलम्भ २-कार्योपलम्भ ३ कारणानुपलम्भ ४ कार्यानुपलम्भ ५ यही कारण पञ्चक है इसी प्रकार वह्निके बिना धूम उपलब्ध नहीं होता है वह्निके नष्ट होनेपर धूम भी नष्ट होजाता है । अतः धूम वह्निसे उत्पन्न और वह्निधूमकी व्याप्ति निश्चित है ॥ ३ ॥ तथा तादात्म्यनिश्चयेनाप्यविनाभावो निश्चीयते । यदि शिंशपा वृक्षत्वमतिपतेत् स्वात्मानमेव जह्यादिति विपक्षे बाधक- प्रवृत्तेः । अप्रवृत्ते तु बाधके भूयः सहभावोपलम्भेऽपि व्यभि- चारशङ्कायाः को निवारयिता ॥ ४ ॥ इस प्रकार स्वभावसे भी व्याप्ति निश्चित होती है । यथा यह शिंशपा वृक्ष है यहांपर शिंशपा यदि वृक्षत्वका अतिक्रमण करेगा अर्थात् शिंशपामें वृक्षत्व न रहेगा तो शिंशपाका स्वरूप ही नष्ट हो जायगा ऐसा बाधक होता है क्योंकि वृक्षविशेष ही शिंशपा है अतः वृक्षत्व शिंशपाका असाधारण धर्म (स्वभाव) है। स्वभावके नाशसे स्वरूप नाश होता है यथा उष्णत्व अग्निका स्वभाव है उसका नाश होनेसे अग्नि भी नष्ट होता है। यदि बाधक न हो तो बहुधा साहचर्य देखनेसे भी व्यभिचार शंकाको कोई भी वारण नहीं कर सकते॥४॥ शिंशपावृक्षयोश्च तादात्म्यनिश्चयो वृक्षोऽयं शिंशपेति सामा- नाधिकरण्यबलादुपपद्यते ॥ ५ ॥ यह शिंशपा वृक्ष है इत्यादि सामानाधिकरण्यसे शिंशपा और वृक्षका रूप करा नहीं निश्चय होता है प्रवृत्तिनिमित्त (धर्म) भिन्न होकर एक विशेष्य (धर्मी) का बोध करानेवाले दो शब्दोंको सामानाधिकरण्य कहते हैं जैसे नील घट यहा नील शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त नील त्व है नीलत्व नीलगुण है क्योंकि नीलशब्द अर्शआद्यजन्त होनेसे नीलवान् परक है नीलवानमें नील विशेषण है त्व तलादि भावप्रत्ययका अर्थ विशेषण है क्यों "प्रकृतिजन्य बोधे प्रकारीभूतो भावः" ऐसा अनुशासन है घट शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त घटत्व है घटत्व और नील गुण दोनों घटमें रहनेसे नील घट इन दोनोंका सामानाधिकरण्य उपपन्न होगया । एव वृक्षत्व शिंशपात्व दोनों शिंशपामें रहनेसे सामानाधिकरण्य ( तादात्म्य ) लक्षण संगत होता है। एवं मृद्-घट, धूम-धूमध्वजादि कार्यकारण भाव स्थलमें भी सामानाधिकरण्यसे तादात्म्य निश्चित होता है ॥ ५ ॥ नह्यत्यन्ताभेदे तत् सम्भवति पर्य्यायत्वेन युगपदपि प्रयोगा- योगात् नाप्यत्यन्तभेदे गवाश्वयोरनुपलब्भात् तस्मात् कार्य्या- त्मानौ कारणमात्मानमनुमापयत इति सिद्धम् ॥ ६ ॥