भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १३ ) बौद्धदर्शन ( अ०स० २ ) यदि कोई शङ्का करे कि अन्वयव्यतिरेकसे अविनाभावका निश्चय हो जायगा पुनः कार्यकारण भावको नियामक क्यों मानते हो जिस वस्तुके रहनेसे जो अवश्य रहे वह अन्वय यथा धूमके रहनेपर वह्नि अवश्य रहती है जिसके न रहने पर जो न रहे वह व्यतिरेक कहाता है । यथा अग्निके न रहनेसे धूम नहीं रहता है । उत्तर- इस पक्षमें साध्य साधनके व्यभिचाराभावका निर्णय न होगा क्यों कि अतीत अनागत, दूर व्यवहितादिस्थित वर्तमानका प्रत्यक्ष न होनेसे उसमें व्यभिचार शङ्काका कारण असम्भव है यदि कहो तादृशस्थलमे कार्यकारणभाव वादिके मतमे भी उक्त दोष समान ही है अतः एक ही पक्षमे निर्भय रहना अनुचित है । कहा है— " यत्रोभयो समो दोषः परिहारोऽपि तादृशः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृशार्थविचारणैरिति ” ॥ एसे नहीं कह सकते क्या कि कारणके बिना भी कार्य उत्पन्न होगा ऐसा कहना अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वचन व्याघात है ॥ २ ॥ तदेव ह्याशङ्क्येत यस्मिन्नाशङ्क्यमाने व्याघातादयो नावत्तरेयुः तदुक्तम्-व्याघातावधिराशङ्केति । तस्मात्तदुत्पत्तिनिश्चयेन अवि- नाभावो निश्चीयेत तदुत्पत्तिनिश्चयश्च कार्य्यहेत्वोः प्रत्यक्षोप लम्भा्रनुपलम्भपञ्चकनिबन्धनः । कार्य्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः उपलम्भस्य पश्चात् कारणानुपल- म्भादनुपलम्भ इति पञ्चकारण्या धूमधूमध्वजयोः कार्यकारण- भाव। निश्चीयते ॥ ३ ॥ शङ्का यही हो सकती है जिसमे व्याघात दोष न आवे अत एव इस विषयमें उदया- र्य्यकी भी सम्मति कहते हैं। "व्याघातेति”—“शङ्काचेदनुमास्त्येव नचेच्छङ्का कुतस्तराम् व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कानिवर्त्तकः” ॥ कालान्तर और देशान्तरमे व्यभिचार या अन्य आशङ्का हो तो अनुमान अवश्य है क्योकि अनुमानके बिना व्यभिचार भा० ०५ का ज्ञान नहीं हो सकता यदि देशान्तर और कालान्तरमे उपाधिकी आशङ्का हीं है तो अनुमान अवश्य होगा शङ्काके निवारणकी आवश्यकता ही नहीं है "वादकथा प्रमायते” शङ्कानिवर्तक कहते है "व्याघातेति” । शङ्काकी अवधि तर्क है क्योकि तर्क शङ्काका निवर्तक है-अत. उत्पत्तिके निश्चयमे अविनाभावका निश्चय होता है । उत्पत्ति- र्णय भी कार्यकारणका प्रत्यक्षापलम्भ अनुपम्भ्ररूप कारणपञ्चकसे निश्चित होता हे यथा उत्पत्तिके पूर्वमें कार्य उपलब्ध नही होता, कारणके उपलब्धिसे उपलब्ध होता है । उपलब्ध कार्य भी कारणके अनुपम्भ ( उपादा-