भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बोध- तस्माद् बहूनां प्राणिनामनुग्रहार्थं चार्वाकमतमाश्रय- णीयमिति रमणीयम् ॥ २५ ॥ इति सायणमाधवीये सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् ॥ वेदको बनानेवाले धूर्त, भड ओर राक्षस यह तीन हैं । जर्फरी तुर्फरी इत्यादि ऋषियाक नाम भी पण्डिताने कल्पित किये हैं । घोडेके लिंगको पत्नी ग्रहण कं इत्यादि अश्लीलवचन भडाक कहे हुए हैं । मांसभक्षणादिक वचन राक्षसोने बनाये ह अतः अनेक जीवोंके कल्याणके लिए चार्वाकमतका अवलम्बन करना ही उत्तम है॥२५ इति सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् । अथ बौद्धदर्शनम् । अत्र बौद्धैरभिधीयते— यदभ्यधायि अविनाभावो दुर्बोध इति तदसाधीयः, तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामविनाभावस्य सुज्ञानत्वा । तदुक्तम्- “कार्य्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमो दर्शनाददर्शनादिति” ॥ १ ॥ चार्वाकमत निरूपणके नन्तर पुनर्जन्मादि निषेधरूप नास्तिकत्वादि समान होनेसे बौद्धमतका निरूपण करते हैं । चार्वाकोंका जो कथन है कि व्याप्तिज्ञान दुर्बोध है सो अयुक्त है क्योंकि उत्पत्ति एव तादात्म्य (स्वभाव) से व्याप्तिका निश्चय हो सकता है कार्य कारण भावसे अथवा स्वभावसे व्याप्ति निश्चित होसकती हे दर्शनसे अथवा अदर्शनसे भी हो सकती है । तात्पर्य यह है कि व्याप्तिग्रहमें कार्य कारण भाव नियामक है । व्याप्य व्यापकका प्रत्यक्ष अपेक्षित नही है ॥१॥ अन्वयव्यतिरेकावविनाभावनिश्चायकाविति पक्षे साध्यसाध- नयोरव्यभिचारो दुर्द्धारणो भवेत् । भूते भविष्यति वर्त्त माने अनुपलभ्यमाने च व्यभिचारशङ्काया अनिवारणात् ननु तथाविधस्थले तावकेऽपि मते व्यभिचारशङ्का दुष्परि- ऽऽ चेत् मैवं विनापि कारणं कार्यमुत्पद्यतामित्येवं विधाय १ क्र[१५]• व्याघातावधितया निवृत्तत्वात् ॥ २ ॥ १ शङ्के ४ आदाने