सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ११ ) जीविकामात्र बनाये हैं ॥ ज्योतिष्टोम यागमें मारे हुए पशु यदि स्वर्गको जायगा तो याग करने- वाले अपने पिताको यज्ञमें क्यों नहीं मारते जिससे पिता भी स्वर्ग पहुँच जाय ॥ २२ ॥ मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम् । गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पनम् ॥ स्वर्गस्थिता यदा तृप्तिं गच्छेयुस्तत्र दानतः । प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते ॥ यावज्जीवेत् सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ यदि गच्छेत्पर लोकं देहादेष विनिर्गतः । कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः ॥ २३ ॥ श्राद्ध करनेमें मरे हुए प्राणियोंकी तृप्ति होती है तो परदेश जानेवाले पाथेय (मार्गके भोज्य)को क्यों लेजाते हैं घरहीमें श्राद्ध करनेसे सब तृप्त हो जायगे ॥ यहा पर दान करनेसे स्वर्गस्थ पितृगण तृप्त होते हों तो कोठे पर बैठ विराजमानके नामस भी यहींसे क्यों नहीं दे देते हो वह तृप्त तो हो ही जायगे और नीचे उतरनेका कष्ट भी न होगा ॥ जबतक जीवे तबतक सुख भोगे । ऋण लेकर भी घृत पीवे देह जलकर भस्म होजानेपर पुन' उसकी उत्पत्ति कहासे हो सकती है ॥ यदि कोई आत्मा इस देहसे निकलकर लोकान्तरमें जाता हो तो बन्धुस्नेहसे व्याकुल होकर पुनः क्यों नहीं घर आता हैं आता तौनहीं अत देहसेभिन्न आत्मा नहीं है । देह ही है सो यहां नष्ट होगया ॥२३॥ ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैर्विहितस्त्विह । मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥ अतः मेरेके लिए प्रेतकार्यादि सब ब्राह्मणोंने अपने जीवनके उपाय बनाये हैं इसके अतिरिक्त कुछ फल नहीं है ॥ २४ ॥ त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भण्डधूर्त्तनिशाचराः । जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृतम् ॥ अश्वस्यात्र हि शिश्नं तु पत्नीग्राह्यं प्रकीर्तितम् । भण्डैस्तद्वत्परं चैव ग्राह्यजातं प्रकीर्त्तितम् ॥ मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरितमिति ।