सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध ानके अधीन व्याप्तिज्ञान है। अतः अविनाभाव दुर्ज्ञेय होनेसे अनुमानादिका अवकाश नहीं। यदि कहो अनुमानका प्रामाण्य ही नहीं तो धूमादि (हेतु) ज्ञानसे अग्न्यादि साध्य) ज्ञानमे प्रवृत्ति कैसे होती है-कहीं २ प्रत्यक्षद्वारा कही ० भ्रान्तिसे होती से कहेगे ॥ २० ॥ क्वचित् फलप्रतिलम्भस्तु मणिमन्त्रौषधादिवत् याहच्छिकः अत- स्तत्तु साध्यमदृष्टादिकं मपि नास्ति । नन्वदृष्टानिष्टौ जगद्वै- चित्र्यमाकस्मिकं स्यादिति चेत् न तद्भद्रम् "अग्निरुष्णो जलं शीतं शीतस्पर्शस्तथानिलः । केनेदं चित्रितं तस्मात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिरिति" ॥ २१ ॥ भ्रान्तिज्ञानसे प्रवृत्त पुरुषको शुक्ति रजत आदिमे फलकी सिद्धि नहीं होती, प्रकृते अग्न्यादिरूप फल प्राप्त होता है। सो क्यों ? वह यहच्छासे (अकस्मात) ही होता यथा मणि मन्त्र औपधादिसे फल होता है-यदि मणि मन्त्र औष्यादिसे निश्चित फ मिलता हो तो एक ही रोगके लिए अनेक औषधियोंको बदल बदल कर क्यों दे[ते] इससे मालूम होता है-रोगनिवृत्त्यादि फल अकस्मात् ही होता है। अतः मन्त्रा[प्रत्य-] अदृष्टादिक भी नहीं, यदि कहो अदृष्ट न मानो तो ससारकी विचित्रता (कोई सुखी कोई दु इत्यादि) न होगी-यह भी नहीं क्योकि यह सब स्वभावसे होते हैं। अग्निको उष्ण, जल शीत, वायुको शीतस्पर्श-विचित्र रूप किसने बनाया अर्थात् किसने नही, यह सब स्व वसे ही होते हैं ॥ २१ ॥ तदेतत् सर्वं बृहस्पतिनाप्युक्तम् । "न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः । नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥ अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुषहीनानां जीविका धातृनिर्मिता ॥ पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति । स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते ॥ २२ ॥ बृहस्पतिने भी [कहा है कि न स्व]र्ग है न मोक्ष है परलोकका सुखभोगनेवाला आ[त्मा] [भी नहीं, वर्णाश्रमादिकी क्रिया] भी फलदायक नहीं है ॥ अग्निहोत्र त्र[यो] [बुद्धि] और पराक्रम शून्यके लिये ब्राह्म[ण]