सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
( १० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध ानके अधीन व्याप्तिज्ञान है। अतः अविनाभाव दुर्ज्ञेय होनेसे अनुमानादिका अवकाश नहीं। यदि कहो अनुमानका प्रामाण्य ही नहीं तो धूमादि (हेतु) ज्ञानसे अग्न्यादि साध्य) ज्ञानमे प्रवृत्ति कैसे होती है-कहीं २ प्रत्यक्षद्वारा कही ० भ्रान्तिसे होती से कहेगे ॥ २० ॥ क्वचित् फलप्रतिलम्भस्तु मणिमन्त्रौषधादिवत् याहच्छिकः अत- स्तत्तु साध्यमदृष्टादिकं मपि नास्ति । नन्वदृष्टानिष्टौ जगद्वै- चित्र्यमाकस्मिकं स्यादिति चेत् न तद्भद्रम् "अग्निरुष्णो जलं शीतं शीतस्पर्शस्तथानिलः । केनेदं चित्रितं तस्मात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिरिति" ॥ २१ ॥ भ्रान्तिज्ञानसे प्रवृत्त पुरुषको शुक्ति रजत आदिमे फलकी सिद्धि नहीं होती, प्रकृते अग्न्यादिरूप फल प्राप्त होता है। सो क्यों ? वह यहच्छासे (अकस्मात) ही होता यथा मणि मन्त्र औपधादिसे फल होता है-यदि मणि मन्त्र औष्यादिसे निश्चित फ मिलता हो तो एक ही रोगके लिए अनेक औषधियोंको बदल बदल कर क्यों दे[ते] इससे मालूम होता है-रोगनिवृत्त्यादि फल अकस्मात् ही होता है। अतः मन्त्रा[प्रत्य-] अदृष्टादिक भी नहीं, यदि कहो अदृष्ट न मानो तो ससारकी विचित्रता (कोई सुखी कोई दु इत्यादि) न होगी-यह भी नहीं क्योकि यह सब स्वभावसे होते हैं। अग्निको उष्ण, जल शीत, वायुको शीतस्पर्श-विचित्र रूप किसने बनाया अर्थात् किसने नही, यह सब स्व वसे ही होते हैं ॥ २१ ॥ तदेतत् सर्वं बृहस्पतिनाप्युक्तम् । "न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः । नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥ अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुषहीनानां जीविका धातृनिर्मिता ॥ पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति । स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते ॥ २२ ॥ बृहस्पतिने भी [कहा है कि न स्व]र्ग है न मोक्ष है परलोकका सुखभोगनेवाला आ[त्मा] [भी नहीं, वर्णाश्रमादिकी क्रिया] भी फलदायक नहीं है ॥ अग्निहोत्र त्र[यो] [बुद्धि] और पराक्रम शून्यके लिये ब्राह्म[ण]
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ११ ) जीविकामात्र बनाये हैं ॥ ज्योतिष्टोम यागमें मारे हुए पशु यदि स्वर्गको जायगा तो याग करने- वाले अपने पिताको यज्ञमें क्यों नहीं मारते जिससे पिता भी स्वर्ग पहुँच जाय ॥ २२ ॥ मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम् । गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पनम् ॥ स्वर्गस्थिता यदा तृप्तिं गच्छेयुस्तत्र दानतः । प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते ॥ यावज्जीवेत् सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ यदि गच्छेत्पर लोकं देहादेष विनिर्गतः । कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः ॥ २३ ॥ श्राद्ध करनेमें मरे हुए प्राणियोंकी तृप्ति होती है तो परदेश जानेवाले पाथेय (मार्गके भोज्य)को क्यों लेजाते हैं घरहीमें श्राद्ध करनेसे सब तृप्त हो जायगे ॥ यहा पर दान करनेसे स्वर्गस्थ पितृगण तृप्त होते हों तो कोठे पर बैठ विराजमानके नामस भी यहींसे क्यों नहीं दे देते हो वह तृप्त तो हो ही जायगे और नीचे उतरनेका कष्ट भी न होगा ॥ जबतक जीवे तबतक सुख भोगे । ऋण लेकर भी घृत पीवे देह जलकर भस्म होजानेपर पुन' उसकी उत्पत्ति कहासे हो सकती है ॥ यदि कोई आत्मा इस देहसे निकलकर लोकान्तरमें जाता हो तो बन्धुस्नेहसे व्याकुल होकर पुनः क्यों नहीं घर आता हैं आता तौनहीं अत देहसेभिन्न आत्मा नहीं है । देह ही है सो यहां नष्ट होगया ॥२३॥ ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैर्विहितस्त्विह । मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥ अतः मेरेके लिए प्रेतकार्यादि सब ब्राह्मणोंने अपने जीवनके उपाय बनाये हैं इसके अतिरिक्त कुछ फल नहीं है ॥ २४ ॥ त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भण्डधूर्त्तनिशाचराः । जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृतम् ॥ अश्वस्यात्र हि शिश्नं तु पत्नीग्राह्यं प्रकीर्तितम् । भण्डैस्तद्वत्परं चैव ग्राह्यजातं प्रकीर्त्तितम् ॥ मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरितमिति ।
( १२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बोध- तस्माद् बहूनां प्राणिनामनुग्रहार्थं चार्वाकमतमाश्रय- णीयमिति रमणीयम् ॥ २५ ॥ इति सायणमाधवीये सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् ॥ वेदको बनानेवाले धूर्त, भड ओर राक्षस यह तीन हैं । जर्फरी तुर्फरी इत्यादि ऋषियाक नाम भी पण्डिताने कल्पित किये हैं । घोडेके लिंगको पत्नी ग्रहण कं इत्यादि अश्लीलवचन भडाक कहे हुए हैं । मांसभक्षणादिक वचन राक्षसोने बनाये ह अतः अनेक जीवोंके कल्याणके लिए चार्वाकमतका अवलम्बन करना ही उत्तम है॥२५ इति सर्वदर्शनसंग्रहे चार्वाकदर्शन समाप्तम् । अथ बौद्धदर्शनम् । अत्र बौद्धैरभिधीयते— यदभ्यधायि अविनाभावो दुर्बोध इति तदसाधीयः, तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामविनाभावस्य सुज्ञानत्वा । तदुक्तम्- “कार्य्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात् । अविनाभावनियमो दर्शनाददर्शनादिति” ॥ १ ॥ चार्वाकमत निरूपणके नन्तर पुनर्जन्मादि निषेधरूप नास्तिकत्वादि समान होनेसे बौद्धमतका निरूपण करते हैं । चार्वाकोंका जो कथन है कि व्याप्तिज्ञान दुर्बोध है सो अयुक्त है क्योंकि उत्पत्ति एव तादात्म्य (स्वभाव) से व्याप्तिका निश्चय हो सकता है कार्य कारण भावसे अथवा स्वभावसे व्याप्ति निश्चित होसकती हे दर्शनसे अथवा अदर्शनसे भी हो सकती है । तात्पर्य यह है कि व्याप्तिग्रहमें कार्य कारण भाव नियामक है । व्याप्य व्यापकका प्रत्यक्ष अपेक्षित नही है ॥१॥ अन्वयव्यतिरेकावविनाभावनिश्चायकाविति पक्षे साध्यसाध- नयोरव्यभिचारो दुर्द्धारणो भवेत् । भूते भविष्यति वर्त्त माने अनुपलभ्यमाने च व्यभिचारशङ्काया अनिवारणात् ननु तथाविधस्थले तावकेऽपि मते व्यभिचारशङ्का दुष्परि- ऽऽ चेत् मैवं विनापि कारणं कार्यमुत्पद्यतामित्येवं विधाय १ क्र[१५]• व्याघातावधितया निवृत्तत्वात् ॥ २ ॥ १ शङ्के ४ आदाने
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १३ ) बौद्धदर्शन ( अ०स० २ ) यदि कोई शङ्का करे कि अन्वयव्यतिरेकसे अविनाभावका निश्चय हो जायगा पुनः कार्यकारण भावको नियामक क्यों मानते हो जिस वस्तुके रहनेसे जो अवश्य रहे वह अन्वय यथा धूमके रहनेपर वह्नि अवश्य रहती है जिसके न रहने पर जो न रहे वह व्यतिरेक कहाता है । यथा अग्निके न रहनेसे धूम नहीं रहता है । उत्तर- इस पक्षमें साध्य साधनके व्यभिचाराभावका निर्णय न होगा क्यों कि अतीत अनागत, दूर व्यवहितादिस्थित वर्तमानका प्रत्यक्ष न होनेसे उसमें व्यभिचार शङ्काका कारण असम्भव है यदि कहो तादृशस्थलमे कार्यकारणभाव वादिके मतमे भी उक्त दोष समान ही है अतः एक ही पक्षमे निर्भय रहना अनुचित है । कहा है— " यत्रोभयो समो दोषः परिहारोऽपि तादृशः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृशार्थविचारणैरिति ” ॥ एसे नहीं कह सकते क्या कि कारणके बिना भी कार्य उत्पन्न होगा ऐसा कहना अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वचन व्याघात है ॥ २ ॥ तदेव ह्याशङ्क्येत यस्मिन्नाशङ्क्यमाने व्याघातादयो नावत्तरेयुः तदुक्तम्-व्याघातावधिराशङ्केति । तस्मात्तदुत्पत्तिनिश्चयेन अवि- नाभावो निश्चीयेत तदुत्पत्तिनिश्चयश्च कार्य्यहेत्वोः प्रत्यक्षोप लम्भा्रनुपलम्भपञ्चकनिबन्धनः । कार्य्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः उपलम्भस्य पश्चात् कारणानुपल- म्भादनुपलम्भ इति पञ्चकारण्या धूमधूमध्वजयोः कार्यकारण- भाव। निश्चीयते ॥ ३ ॥ शङ्का यही हो सकती है जिसमे व्याघात दोष न आवे अत एव इस विषयमें उदया- र्य्यकी भी सम्मति कहते हैं। "व्याघातेति”—“शङ्काचेदनुमास्त्येव नचेच्छङ्का कुतस्तराम् व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कानिवर्त्तकः” ॥ कालान्तर और देशान्तरमे व्यभिचार या अन्य आशङ्का हो तो अनुमान अवश्य है क्योकि अनुमानके बिना व्यभिचार भा० ०५ का ज्ञान नहीं हो सकता यदि देशान्तर और कालान्तरमे उपाधिकी आशङ्का हीं है तो अनुमान अवश्य होगा शङ्काके निवारणकी आवश्यकता ही नहीं है "वादकथा प्रमायते” शङ्कानिवर्तक कहते है "व्याघातेति” । शङ्काकी अवधि तर्क है क्योकि तर्क शङ्काका निवर्तक है-अत. उत्पत्तिके निश्चयमे अविनाभावका निश्चय होता है । उत्पत्ति- र्णय भी कार्यकारणका प्रत्यक्षापलम्भ अनुपम्भ्ररूप कारणपञ्चकसे निश्चित होता हे यथा उत्पत्तिके पूर्वमें कार्य उपलब्ध नही होता, कारणके उपलब्धिसे उपलब्ध होता है । उपलब्ध कार्य भी कारणके अनुपम्भ ( उपादा-
( १४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध नकारणनाश) के पश्चात् उपलब्ध नहीं होता, इत्यादि क्रम है उत्पत्तिके पूर्व अनुपलब्ध कारणोपलम्भ २-कार्योपलम्भ ३ कारणानुपलम्भ ४ कार्यानुपलम्भ ५ यही कारण पञ्चक है इसी प्रकार वह्निके बिना धूम उपलब्ध नहीं होता है वह्निके नष्ट होनेपर धूम भी नष्ट होजाता है । अतः धूम वह्निसे उत्पन्न और वह्निधूमकी व्याप्ति निश्चित है ॥ ३ ॥ तथा तादात्म्यनिश्चयेनाप्यविनाभावो निश्चीयते । यदि शिंशपा वृक्षत्वमतिपतेत् स्वात्मानमेव जह्यादिति विपक्षे बाधक- प्रवृत्तेः । अप्रवृत्ते तु बाधके भूयः सहभावोपलम्भेऽपि व्यभि- चारशङ्कायाः को निवारयिता ॥ ४ ॥ इस प्रकार स्वभावसे भी व्याप्ति निश्चित होती है । यथा यह शिंशपा वृक्ष है यहांपर शिंशपा यदि वृक्षत्वका अतिक्रमण करेगा अर्थात् शिंशपामें वृक्षत्व न रहेगा तो शिंशपाका स्वरूप ही नष्ट हो जायगा ऐसा बाधक होता है क्योंकि वृक्षविशेष ही शिंशपा है अतः वृक्षत्व शिंशपाका असाधारण धर्म (स्वभाव) है। स्वभावके नाशसे स्वरूप नाश होता है यथा उष्णत्व अग्निका स्वभाव है उसका नाश होनेसे अग्नि भी नष्ट होता है। यदि बाधक न हो तो बहुधा साहचर्य देखनेसे भी व्यभिचार शंकाको कोई भी वारण नहीं कर सकते॥४॥ शिंशपावृक्षयोश्च तादात्म्यनिश्चयो वृक्षोऽयं शिंशपेति सामा- नाधिकरण्यबलादुपपद्यते ॥ ५ ॥ यह शिंशपा वृक्ष है इत्यादि सामानाधिकरण्यसे शिंशपा और वृक्षका रूप करा नहीं निश्चय होता है प्रवृत्तिनिमित्त (धर्म) भिन्न होकर एक विशेष्य (धर्मी) का बोध करानेवाले दो शब्दोंको सामानाधिकरण्य कहते हैं जैसे नील घट यहा नील शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त नील त्व है नीलत्व नीलगुण है क्योंकि नीलशब्द अर्शआद्यजन्त होनेसे नीलवान् परक है नीलवानमें नील विशेषण है त्व तलादि भावप्रत्ययका अर्थ विशेषण है क्यों "प्रकृतिजन्य बोधे प्रकारीभूतो भावः" ऐसा अनुशासन है घट शब्दका प्रवृत्तिनिमित्त घटत्व है घटत्व और नील गुण दोनों घटमें रहनेसे नील घट इन दोनोंका सामानाधिकरण्य उपपन्न होगया । एव वृक्षत्व शिंशपात्व दोनों शिंशपामें रहनेसे सामानाधिकरण्य ( तादात्म्य ) लक्षण संगत होता है। एवं मृद्-घट, धूम-धूमध्वजादि कार्यकारण भाव स्थलमें भी सामानाधिकरण्यसे तादात्म्य निश्चित होता है ॥ ५ ॥ नह्यत्यन्ताभेदे तत् सम्भवति पर्य्यायत्वेन युगपदपि प्रयोगा- योगात् नाप्यत्यन्तभेदे गवाश्वयोरनुपलब्भात् तस्मात् कार्य्या- त्मानौ कारणमात्मानमनुमापयत इति सिद्धम् ॥ ६ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १५ ) दोनों वस्तुए अत्यन्त अभिन्न होनेपर तादात्म्य असम्भव है। क्यो कि अत्यन्त अभेद में पर्याय होता है पर्यायवाचक अनेक शब्दोंका एक साथ प्रयोग नहीं होता है यथा घट कलश इत्यादि अत्यन्त भेदमें भी तादात्म्य नहीं होता कोई भी अश्व महिप को तादात्म्य नहीं कहते अतः भेदाभेद समनियत तादात्म्य है तथाच कार्य रूपसे भेद और कारण रूपसे अभेद होनेपर कार्य वस्तु कारणका अनुमान करता है यह सिद्ध हुआ ॥ ६ ॥ यदि कश्चित् प्रामाण्यमनुमानस्य नांगीकुर्यात् तं प्रति ब्रूयात् अनुमानप्रमाणं न भवतीत्येतावन्मात्रमुच्यते तत्र न किञ्चन साधनमुपन्यस्यते उपन्यस्यते वा । न प्रथम॰, एकाकिनी प्रति- ज्ञा हि प्रतिज्ञातं न साधयेदिति न्यायात्। नापि चरमः, अनुमानं प्रमाणं न भवतीति ब्रुवाणेन त्वया (अशिरस्क) साधनवचनस्यो_ पन्यासे मम माता वन्ध्येतिवद् व्याघातापातात् ॥ ७ ॥ यदि कोई अनुमान प्रमाण न माने तो उससे पूछना चाहिये क्या अनुमान प्रमाण नहीं इतना ही कहते हो या कुछ हेतुका भी उपन्यास करते हो, ऐसा नियम है केवल प्रतिज्ञा मात्रसे वस्तुसिद्धि नहीं होती है पर्वतमें अग्नि है इस प्रतिज्ञामात्र से कोई सन्तुष्ट न होगा धूमादि हेतुको भी दिखाना पडेगा अतः प्रथम विकल्प असम्भव है । द्वितीय पक्षमें अनुमान अप्रमाण है प्रमितिकरणतावच्छेदकधर्मशून्य होनेसे इत्यादि हेतु और साध्य दिखाकर अनुमान ही करोगे तब तो अनुमानको अप्रामाण्य साधनेमें भी अनुमान ही प्रमाण होनेसे अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान वदतो व्याघात होगा ॥ ७ ॥ किञ्चप्रमाणतदाभासव्यवस्थापनंतत्समानजातीयत्वादितिवदता भवतैव स्वीकृतं स्वभावानुमानम् । परगता विप्रतिपत्तिस्तु वच- नलिङ्गेनेति ब्रुवता कार्यलिङ्गमनुमानम् अनुपलब्ध्या कश्चिदर्थं प्रतिषेधयतानुपलब्धिलिङ्गमनुमानम् । तथा चोक्तं तथागतैः- प्रमाणान्तरसामान्यस्थितिरन्यधियो गतेः । प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचिदिति ॥ पराक्रान्तञ्चात्र सूरिभिरिति ग्रन्थभूयस्त्वभयादुपरम्यते॥८॥ 'किञ्चेति'-दूरसे नदी आदिमें जलको देखकर यह जल है ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण । अन्यत्र दृष्ट जलके सजातीय होनेसे एवं मृगतृष्णादिमे जल प्रत्यक्षज्ञान अप्रमाण
( १६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध- ह अर्थात् प्रमाणाभास है। इस भाँति कहकर स्वयं स्वभावानुमानको स्वीकार कर लिया। एव अन्यदीय विरुद्धाभिप्राय वचनरूप हेतुसे अवगत होता है, इस प्रकार कहकर कार्यमे कारणका अनुमान भी मानलिया, अनुपलब्धि हेतुसे घटादि वस्तुका प्रतिषेध करनेसे अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमानको भी स्वीकार ही किया । उक्त तीनो अनुमानोको सङ्ग्रह करके कहते हैं। 'तथा चोक्तमित्यादि'। प्रमाणान्तर सामान्यपरसे प्रलय प्रमाद तदभाव व्यवस्थापनरूप स्वभावानुमान “अन्यधिय. गते” इन शब्दोस् कार्यलिङ्गरूक अनुमान् अवशिष्टसे अनुपलब्धिलिङ्गक अनुमान हो गये हैं ॥ ८ ॥ ते च बौद्धाश्चतुर्विधया भावनया परमपुरुषार्थं कथयन्ति । ते च माध्यमिकयोगाचारसौत्रान्तिकवैभाषिकसञ्ज्ञाभिः प्रसिद्धाः बौद्धा यथाक्रमं सर्व्वशून्यत्वबाह्यशून्यत्वबाह्यार्थानुमेयत्वबाह्या- र्थप्रत्यक्षत्ववादानातिष्ठन्ते ॥ ९ ॥ दूरसे नदी आदि जल्को देखकर यह जल है, ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण है अन्यत्र दृष्ट जलके सजातीय होनेसे एव मृगतृष्णादिमे जल प्रत्यक्षज्ञान अप्रमाण है अर्थात् प्रमाणाभास है। इस भाँति कहकर स्वयं स्वभावानुमानको स्वीकार किया यहा तक बौद्धोने चार्वाक मतको सयुक्ति खण्डन किया । आगे स्वसिद्धान्त कहते है बौद्ध वक्ष्य माण चारप्रकारकी भावनासे ही परम पुरुषार्थ मानते हे ये माध्यमिक योगाचार, सौत्रा न्तिक और वैभाषिक भेदसे चार प्रसिद्ध है । माध्यमिक बाह्याभ्यन्तर समस्त वस्तुको शून्य मानते है । योगाचार बाह्यवस्तुको शून्य मानते है । सौत्रान्तिक बाह्यवस्तुको अनुमेय मानते हैं और वैभाषिक लोग बाह्यवस्तुको प्रत्यक्ष कहते हैं। मा यमिकादिसञ्ज्ञा का निमित्त आगे चलकर स्पष्ट होगा ॥ ९ ॥ यद्यपि भगवान् बुद्ध एक एव बोधयिता तथापि बोद्धव्यानां बुद्धिभेदाच्चातुर्विध्यं यथा तोऽस्तमर्क इत्युक्ते जारचौरानूचा-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १७ ) सर्व्वं क्षणिकं क्षणिकं दुःखं दुखं स्वलक्षणं स्वलक्षणं शून्यं शून्यमिति भावनाचतुष्टयमुपदिष्टं द्रष्टव्यम् ॥ ११ ॥ "भावनाका आकार" समस्त वस्तु क्षणिक है क्षणिक हैं-१-समस्त वस्तु दुःखात्मक हैं-२- क्षणिक होनेके कारण अन्यवस्तुका सादृश्य न होसकनेसे स्वलक्षण-स्वलक्षण -३- समस्त वस्तु शून्य है शून्य है ४ यही भावनाचतुष्टय है ॥ ११ ॥ तत्र क्षणिकत्वं नीलादिक्षणानां सत्त्वेनानुमातव्यं यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरपटल सन्तश्चामी भावा इति ॥ १२ ॥ क्षणिकत्व साधन युक्ति कहते हैं "तत्रेत्यादि" नीलादिवस्तुके क्षणिकत्वका सत्वरूप हेतुसे अनुमान किया जाता है *। क्षणिकत्व साधक अनुमान-यत् सत् (जो सत् है) तत् क्षणिकम् ( वह क्षणिक है ) यथा जलधर पटल ( जिसप्रकार मेघमडल नीलादि भाव भी सत् है अतः वह भी क्षणिक है-जहा जहा सत्व है वहा सर्वत्र क्षणिकत्व है यही व्याप्ति हुई बौद्धमतमें अनुमानके उदाहरण उपनय दो अवयव हैं। जलधरपटल पर्यन्त व्याप्तिप्रति पादक उदाहरण है, सन्तश्चामीभावाः पक्षधर्मता प्रतिपादक उपनय है ॥ १२ ॥ न चायमसिद्धो हेतुः, अर्थक्रियाकारित्वलक्षणस्य सत्त्वस्य नीला- दिक्षणानां प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । व्यापकव्यावृत्त्या व्याप्यव्यावृत्ति- न्यायेन व्यापकक्रमाक्रमव्यावृत्तावक्षणिकत् सत्त्वाव्यावृत्तेः सिद्धत्वाच्च । तच्चार्थक्रियाकारित्व क्रमाक्रमाभ्यां व्याप्तं न च क्रमाक्रमाभ्यामन्यः प्रकारः समस्ति । "परस्परविरोधे हि न प्रकारन्तरस्थिति । नैकतापि विरुद्धानामुक्तमात्रविरोधतः" इति न्यायेन व्याघातस्योद्भटत्वात् ॥ १३ ॥ यदि कहो हेतुका पक्षवृत्तित्त्व न होनेसे आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभास होता है सो यहा पर भी घटादि पक्षमें सत्वरूप हेतुका आश्रयासिद्ध होगा, यह भी नहीं क्यों कि अर्थ- क्रियाकारित्व ही सत्व है अर्थ प्रयोजन तद्रूपा क्रिया अर्थक्रिया प्रयोजनीक्रियाकारि त्व किञ्चित्करत्वमिति यावत् एतादृशसत्व नीलादि क्षणमें प्रत्यक्ष सिद्ध है। व्यापकके न रहनेसे व्याप्य भी नही रहता ऐसा नियम है जैसे वह्निके न रहनेसे
- कोई कोई ऐसे भी कहते हैं कि बौद्धके मतमें काल अतिरिक्त पदाथ नहीं है क्षण्यते दीस्यते इस व्युत्प त्तिस-लब्ध जो क्षण है उसके साथ नीलादिको कर्मधारय समास करनेसे नीलादिरूपक्षण यही अर्थ होता है क्षणिक-व्यवहार राहो शिर नीलापुनरा शरीर इत्यादिद्वत् है। "अविरुद्ध है या नहीं इसका' निर्णय उद्धीके ग्रन्थसे ही हो सकता है। २
( १८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध धूम भी नहीं रहता सत्त्वका व्यापक क्रम और अक्रम है यह क्षणिक ही म सम्भव है अतः व्यापक क्रमाक्रम अक्षणिकसे (स्थिरसे) व्यावृत होनेसे उसका व्याप्य सत्त्व भी अक्ष- णिकसे व्यावृत होता है। अर्थक्रियाकारित्वरूप सत्त्व क्रम (पर्याय) अक्रम (युग पत्) से व्याप्त है अर्थात् क्रमाक्रमसत्त्वका व्यापक है। अर्थ क्रियाकारित्व (किञ्चि- त्करत्व) के लिये क्रम अक्रम दोनोंको छोडकर तीसरा मार्ग ही नहीं। क्रमके विरुद्ध है अक्रम और अक्रमके विरुद्ध है क्रम इन दोनोंसे परस्परविरुद्ध प्रकारान्तर नहीं हो सकता। क्रमाक्रम जो विरुद्ध है उसका एकत्र भी नहीं हो सकता। क्योंकि यह वचनसे ही विरुद्ध है उक्तयुक्तिसे व्याहति भी स्पष्ट है ॥ १३ ॥ तौ च क्रमाक्रमौ स्थायिनः सकाशाद्व्यावर्त्तमानौ अर्थक्रिया- मपि व्यावर्तयन्तौ क्षणिकत्वपक्ष एव सत्त्वं व्यवस्थापयत इति सिद्धम् ॥ १४ ॥ उक्त क्रमाक्रम अक्षणिकमें असम्भव होनेसे स्थायीसे स्वयं व्यावृत होते हुए व्याप्य भूत अर्थक्रियाको भी व्यावृत्ति कराकर क्षणिकपक्षमें सत्त्वको व्यवस्थित करते हैं ॥१४॥ नन्वक्षणिकस्यार्थक्रियाकारित्वं किं न स्यादिति चेत् तदयुक्तं विकल्पासहत्वात् । तथा हि-वर्त्तमानार्थक्रियाकरणकाले अती- तानागतयो * किमर्थकियोः स्थायिनः सामर्थ्यमस्ति नो वा ? आद्ये तयोर्निराकरणप्रसङ्गः, समर्थस्य क्षेपायोगात्। यत् यदा यत्करणसमर्थं तत् तदा तत् करोत्येव यथा सामग्री स्वकार्ये समर्थश्चायं भाव इति प्रसङ्गानुमानाच्च । द्वितीयेऽपि कदापि न कुर्यात् सामर्थ्यमात्रानुबन्धित्वादर्थक्रियाकारित्वस्य यत् यदा यन्न करोति तत् तदा तत्रासमर्थं यथा हि शिलाशकल-
- यहां पर तात्पर्य यह है कि कुसूल (बखार) स्थबीजसे अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता, क्षेत्रस्थ बीजसे उत्त होता है । अब दोनों स्थानका बीज एक होता तो कुसूलमें भी अङ्कुर अवश्य उत्पन्न होता परन्तु ऐसा ही नहीं अतः क्षेत्रस्थावस्थामें पूर्व (कुसूलस्थ) बीज नष्ट होकर बीजान्तर उत्पन्न होगया ऐसा अवश्य मानना होगा एव-घटादिक भी वर्तमान क्षणमें अतीत अनागत काय्र्यक्रियाको नहीं करता अतः तीत अनागत क्ष क्रिया सामर्थ्य उसमें नहीं है ऐसा कहना होगा यह क्षणिकपक्ष माने बिना नहीं हो सकता क्योंकि बौद्ध मत में कार्य्य और सत्ता सब एक है सामर्थ्याभावमें सत्ताका भी अभाव है युगपत् सर्वक्रिया उत्पादन पक्षमें १ ला क्षणमें समस्त क्रिया करनेसे "कृतस्य करणमाम्नीति' न्यायसे द्वि-तीयादिक्षणमें अर्थक्रियाकारित्व का गन्ध भी नहीं रहेगा। एक क्षणिक क्षणमात्रवृत्ति है अर्थात् अनेक क्षणमें शक्ति होकर काय्र्यवृत्ति हो
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १९ ) मंकरे । न चैष वर्त्तमानार्थक्रियाकरणकाले वृत्तवर्त्तिष्यमाणे अर्थक्रिये करोतीति तद्विपर्ययाच्च ॥ १५ ॥ शङ्का-अक्षणिक (स्थिरको) अर्थक्रियाकारित्व क्यों नहीं हो सकता है । उत्तर- स्थिर पदार्थ वर्त्तमानकालमें जो कार्य करता है उस कालमें अतीत और अनागत कार्य करनेका उस पदार्थको सामर्थ्य है या नहीं ? यदि है तो उसका त्याग करना असम्भव होगा अर्थात् वर्त्तमान अर्थक्रियाकरण समयमें ही भूत भविष्य अर्थक्रिया भी होने लगेगी परन्तु ऐसा होता नहीं । यह नियम है कि जो वस्तु जिस समय जिस कार्यके करनेमें समर्थ है वह उसकालमें उसकार्यको करता है जिस प्रकार सामग्री (दण्ड चक्रादि) अपना कार्य (घटादि) को उत्पन्न करते हैं यदि कहो समर्थ नहीं तो पुनः कदापि उस कार्यको नहीं कर सकेगा, सामर्थ्यके आधीन ही कार्य होता है ॥ जो जिस समयमें जिस कार्यको नहीं कर सकता । वह उसमें उस समय असमर्थ है जिस प्रकार पाषाणखण्ड अङ्कुरको नहीं कर सकता यह भी (स्थायित्वेनाभिमत) वर्तमान अर्थक्रियाके उत्पा- दन समयमें अतीतानागत अर्थक्रिया (प्रयोजनीभूतकार्य) नहीं करता है ऐसा अन्वय व्यतिरेक दोनों होते हैं ॥ १५ ॥ ननु क्रमवत् सहकारिलाभात् स्थायिनः अतीतानागतयो- क्रमेण क्रमणमुपपद्यते इति चेत् तत्रेदं भवान् पृष्टो व्याचष्टां सह- कारिणः किं भावस्योपकुर्व्वन्ति न वा ? न चेत् नापेक्षणीयास्ते अकिञ्चित्कुर्व्वतां तेषां तादर्थ्यायोगात् । उपकारकत्वपक्षे सोऽ- यमुपकारः किं भावादभिद्यते न वा ? भेदपक्षे आगन्तुकस्यैव तस्य कारणत्वं स्यात् न भावस्याक्षणिकस्य आगन्तुकातिशया- न्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् कार्य्यस्य ॥ १६ ॥ यदि कहो सहकारी कारणकी उपलब्धि क्रमसे होती है अतः वस्तु स्थिर होनेपर भी क्रमसे ही अर्थक्रियाका सम्पादन करेगी क्योंकि सहकारी कारणके विना कार्य नहीं हो सकता । प्रथम इसका उत्तर दो क्या सहकारी कारण भाव अर्थात् प्रधानकारणका कोई उपकार करता है या नहीं? उपकार नहीं करता हो तो? अकिञ्चित्कर होनेसे उसकी अपेक्षा ही व्यर्थ होगी । यदि कहो उपकार करता है तो क्या वह उपकार (शक्ति) स्थिर पदार्थसे भिन्न है या अभिन्न ? भिन्न मानो तो सहकारीसे आया हुआ उपकार (शक्ति) अर्थ क्रियाका कारण हुआ न कि अक्षणिक पदार्थ कारण हुआ आगन्तुक अतिशयके रहनेसे कार्य होता है उसके न रहनेसे नहीं होता है इसप्रकार आगन्तुक अतिशयके अन्वय व्यतिरेकाधीन कार्य हुआ ॥ १६ ॥
( २० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध- तदुक्तम्- "वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्म्मण्यस्ति तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः" इति ॥ १७ ॥ उसी को कहते हैं- "वर्षातपाभ्यामित्यादि" वर्षाका फल है आर्द्र करना आतपका फल है शुष्क करना यह दोनो निर्विकार ( नित्य ) आकाशमें नहीं हो सकते आकाश न भी- जता है न सूखता है उक्त दोनों फल चर्मम होते हैं क्योंकि यह विकारी है । इस प्रकार वस्तुको चर्मके समान मानो तो विकारी होनेसे अनित्य हो जायगा । आकाशके समान निर्विकार मानो तो सहकारी भी निष्फल हो जायगा ॥ १७ ॥ अथ भावस्तै सहकारिभिः सहैव कार्यं करोतीति स्वभाव इति चेत् अस्तु तर्हि सहकारिणो न जह्यात् प्रत्युत पलायमाना- नपि गले पाशेन बद्ध्वा कृत्य कार्यं कुर्यात् स्वभावस्यान- पायात् । किञ्च सहकारिजन्योऽतिशयः किमतिशयान्तरमार- भते न वा ? उभयथापि प्रागुक्तदूषणपाषाणवर्षणप्रसङ्गः ॥१८॥ यदि कहो वस्तुका स्वभाव ही ऐसा है जो सहकारीके साथ ही कार्य करता है हे आयुष्मन् ! फिर तो सहकारीको छोडगा ही नहीं प्रत्युत भागता हो तो गलेमें रस्सी बाधकर कार्य करावेगा । क्योकि स्वभावका त्याग नहीं होता है स्वभावनाश होनेसे स्वरूप का भी नाश होगा । और भी दूषण देते हैं- "किञ्चेति" क्या सहकारीसे उत्पन्न अतिशय अतिश- यान्तरको उत्पादन करता है या नहीं ? दोनों पक्षमें उपकारकत्व पक्षम उक्त दूषणपाषाणकी महावृष्टि होगी । अर्थात् यदि अतिशयको न आरम्भ करे तो अकिञ्चित्कर होगा यदि अतिशयान्तरको आरम्भ करे तो क्या वह अतिशय पूर्व अतिशयसे भिन्न है या अभिन्न ? भेदपक्षमें पूर्वातिशय व्यर्थ है इत्यादि अभेदपक्षमे दूषण आगे चलकर मिलेगा ॥१८॥ अतिशयान्तरारम्भपक्षे बहुमुखानवस्थादौस्थ्यमपि स्यात् । अतिशये जनयितव्ये सहकार्यन्तरापेक्षायां तत्परम्परापात इत्येकानवस्था आस्थेया । तथाहि-सहकारिभिः सलिलपवना- दिभि पदार्थसार्थैराधीयमाने बीजस्यातिशये बीजमुत्पादक- मभ्युपेयम् । अपरथा तदभावेऽप्यतिशयः प्रादुर्भवेत् बीजञ्चाति- शयमादधान सहकारिसापेक्षमेवाधत्ते । अन्यथा सर्वदोपकारा- पत्तौ अङ्कुरस्यापि सदोदयः प्रसज्येत । तस्मादतिशयार्थमपे- क्षमाणैः सहकारिभिरतिशयान्तरमाधेय बीजे तस्मिन्नप्युपकारे
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१ ) पूर्व्वन्यायेन सहकारिसापेक्षस्य बीजस्य जनकत्वे सहकारि- सम्पाद्यबीजगतातिशयानवस्था प्रथमा व्यवस्थिता ॥ १९ ॥ अतिशयान्तरारम्भपक्षमे अनेक प्रकारकी अनवस्था भी है । अतिशयको उत्पन्न करनेके लिये पूर्व्यापेक्षा अन्य सहकारीकी अपेक्षा होगी उससे उत्पन्न दूसरा अतिशय पुनः तीसरे अतिशयको आरम्भ करेगा उसके लिये पुनः तीसरे सहकारीकी अपेक्षा इस क्रम से परम्परा बढती जायगी । यह एक प्रकारकी अनवस्था हुई । यथा अंकुरके लिये बीज कारण है क्षिति जल पवनादि सहकारी है तादृश सहकारी सम्मिलित होनेसे बीजमे जो अतिशय उत्पन्न होता है उसके लिये बीजको कारण मानना होगा । नहीं तो बीज न रहनेपर भी केवल सहकारीसे अतिशय उत्पन्न होने लगेगा, अतिशयको बीज धारण करता है परन्तु सहकारीके विना नहीं धारण कर सकता अतः सहकारीकी अपेक्षा होगी, नही तो उपकार ( अतिशय ) सदा बने रहनेसे अंकुर भी सदा उत्पन्न होने लगेगा ॥ अतः अतिशयके लिये अपेक्षित सहकारीसे बीजमे अतिशयान्तर अवश्य मानना होगा । उस अतिशयमे भी पुनः सहकारीकी अपेक्षा और बीजकी अपेक्षा एव क्रमसे सहकारी से सम्पाद्य बीजगत अतिशयकी अनवस्थारूप प्रथम अनवस्था हुई ॥ १९ ॥ अथोपकारः कार्यार्थमपेक्षमाणोऽपि बीजादिनिरपेक्ष कार्य्यं जनयति तत्सापेक्षो वा ? प्रथमे बीजादेरहेतुत्वमापतेत् । द्वितीये अपेक्ष्यमाणेन बीजादिना उपकारे अतिशय आधेय एव तत्र तत्रापीति बीजादिजन्यातिशयनिष्ठातिशयपरम्परापात इति द्वितीयानवस्था स्थिरा भवेत् । एवमपेक्ष्यमाणेनोपकारेण बीजा- द्वैर्धर्मिण्युपकारान्तरमाधेयमित्युपकाराधेयबीजातिशयाश्रया- तिशयपरम्परापात इति तृतीयानवस्था दुरवस्था स्यात् ॥२०॥ अंकुरादि कार्य्यके लिये अपेक्षित उपकार ( अतिशय ) क्या बीजादिके निर १ होकर स्वयं अंकुरादिको उत्पन्न करता है या बीजादिके सापेक्ष होकर करता है निरपेक्ष ने तो बीजादिका कारण न होनेसे व्यर्थ हो जायेंगे । सापेक्ष कहे तो अपेक्षित बीजादि उपकारमे अतिशय आधान करेगा । उनमें पुनः अतिशयान्तर उत्पन्न होगा उसके ये बीजान्तरकी अपेक्षा होगी । पुनरपि एव इस क्रमसे बीजादिसे जायमान जो अतिशय समे पुनः अतिशय कर उसमें भी अतिशय इत्यादि दूसरी अनवस्था भी स्थिर होगी । सी प्रकार अपेक्षित उपकारसे बीजादि धर्मी ( आश्रयमे ) भी उपकारान्तर मानना
'( २४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध-
अतीतानागत प्रयोजन क्रियाके लिये असमर्थ है, वही प्रसङ्ग है । जो पदार्थ ( बीजा दि ) जिस कालमें जिस कार्यको करता है वह उस कार्यम समर्थ है । जिस प्रकार जल पवनादि सामग्री स्वकार्योत्पादनमें समर्थ है । अतीतअनागत कालम यह भी बीजादि तत्तत्कालवर्त्ती अर्थक्रियाको उत्पादन करते हैं । यही प्रसङ्गव्यत्यय अर्थात् प्रसङ्गाभाव रूप विपर्यय है । अतः विपक्ष ( स्थिरपक्ष ) में क्रम यौगपद्य न होनेसे व्यापकाभावसे गृहीत व्यतिरेकव्याप्ति प्रसङ्ग तद्विपर्ययमे गृहीत अन्वयव्याप्तिका जो सत्त्व है वह क्षणि कत्व पक्षमें ही उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ २३ ॥
- तदुक्तं ज्ञानश्रिया- " यत्सत्तत्क्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी सत्ता शक्तिरिहार्थकर्मणि मितेः सिद्धेषु सिद्धा न सा ॥ नाप्येकैव विधान्यथा परकृतेनापि क्रियादिर्भवेद् द्वेधापिक्षणभङ्गसङ्गतिरतः साध्ये च विश्राम्यति" इति ॥ २४॥ ज्ञानश्रीनामक बौद्धोंके आचार्यने कहा है । जो वस्तु सत् है वह क्षणिक है जिस प्रकार जलधर । घटादि भाव भी सत् है अतः वह भी क्षणिक होगा । सत्तारूप जो शक्ति है वह अर्थक्रियाकारित्व है । यह मिति-( प्रमाण ) से सिद्ध होता है । वह शक्ति सिद्ध अर्थात् ( स्थिर ) पदार्थ में सिद्ध नही होसकती । "नाप्येकैवेति" अक्षणिकसे कार्योंत्पत्तिमें एक ही प्रकार नहीं किन्तु क्रम और अक्रम दो प्रकार है। अन्यथा अन्यकी कृतिसे अन्यमें क्रिया दर्शनस्पर्शनादि होने लगेगा। क्रम अक्रम दोनों पक्षमें क्षण भङ्गत्व सिद्ध होते हैं* ॥ २४ ॥ न च कणभक्षाक्षचरणादिपक्षकक्षीकारेण सत्तासामान्ययोगि- त्वमेव सत्त्वमिति मन्तव्यं सामान्यविशेषसमवायानामसत्त्व- प्रसङ्गात् ॥ २५ ॥ आगे सामान्यखण्डनका उपक्रम करते ह-"नच कणभक्षेति'। कणभक्ष-औलूक्य है यह बाल्यावस्थाम कपोत वृत्तिको धारणकर मार्गम गिरे हुए अन्नके कणोंको बीनकर
- यदि कोई शङ्का करे कुशूलादिमें एवं अङ्कुरादिमें प्रयोजनरूप क्रियाजनकत्व है क्योंकि कुशूल घटादि कार्यको करता है बीजादि अङ्कुरादि कार्यको करता है परन्तु घटादिम अर्थक्रियाकारित्व क्या है ? तिसका उत्तर-घटादिमें भी जलहरणादि प्रधानक्रियानिर्वाहकत्व है अतएव विषयता सम्बन्धसे ज्ञानक्रिया कारित्व सर्वत्र है। यह भी समझना आवश्यक है कि शास्त्रकृत् लोग शास्त्रविचारके समय किसी वस्तुका देना होता है तब घटपटादि वस्तुका नाम लेते हैं-परन्तु प्राचीनलोग ऐस समयपर नीलपीतादिका नाम लेते
- यह नीलादि वर्णवाची नही किन्तु घटादि वस्तुमात्रका उपलक्षण है ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २५ ) निर्वाह करते रहे अतः उनका नाम कणाद (कणभक्ष) हुआ। उलूक ऋषिके अपत्य (पुत्र) होनेसे औलूक्य नाम हुआ। उनका शास्त्र वैशेषिक है। अक्षपाद गौतम हैं। इनका न्यायशास्त्र है। इनके मतमें व्यक्तिसे अतिरिक्त सामान्य (जाति) एक पदार्थ है- उस सामान्यमें दो भेद हैं, पर और अपर। द्रव्य गुण, कर्म, इन तीनोंमें रहनेवाला परसा- मान्य है उसीको सत्ता सामान्य कहते हैं। तथा च तादृशसत्ता सामान्यवत्त्व ही सत्त्व है- अर्थ क्रियाकारित्व सत्त्व नहीं ऐसा नहीं मान सकते सामान्य, विशेष, समवायपर सामान्य न होनेसे उनका असत्त्वप्रसग होगा। कहा भी है-"सामान्यपरहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मता" इति-॥ २६ ॥ न च तत्र स्वरूपसत्तानिबन्धनः सव्यवहारः, प्रयोजकगौरवा- पत्तेः, अनुगतत्वाननुगतत्वविकल्पपराहतैश्च, सर्षपमहीधरा- दिषु विलक्षणेषु क्षणेष्वनुगतस्याकारस्य मणिषु सूत्रवद् भूतग- णेषु गुणवच्चाप्रतिभासनाच्च ॥ २६ ॥ यदि कहो उसमें सद् व्यवहार स्वरूपसत्ता (विद्यमानता) मूलक है जातिमूलक नहीं तो कही २ सद्व्यवहार प्रयोजिकासत्तासामान्य, कहीं २ स्वरूपसत्ता होगी तो भिन्नभिन्न प्रयोजक कल्पनाका गौरव होगा। कहा कहा अनुगत है कहा अननुगत है यह व्यवस्था भी न होगी। जिस प्रकार नाना पुष्परचित मालाके अन्तर्गत प्रत्येक पुष्पो सें सूत्र प्रविष्ट रहता है, जिस प्रकार पृथिव्यादि द्रव्योंमें गुण विद्यमान रहता है, तिसी प्रकार पर्वत सर्षपादि विलक्षण वस्तुओंम अनुगत सामान्यका प्रतिभास (प्रत्यक्ष) भी नहीं होता ॥ २६ ॥ किञ्च सामान्यं सर्वगतं स्वाश्रयसर्वगतं वा ? प्रथमे सर्ववस्तुसं- करप्रसङ्गः, अपसिद्धान्तापत्तिश्च । यतः प्रोक्त प्रशस्तपादेन-स्व विषयसर्वगतमिति। किञ्च विद्यमाने घटे वर्त्तमानं सामान्यमन्यत्र जायमानेन सम्बध्यमान तस्मादागच्छत्सम्बध्यते अनागच्छ- द्वा ? आद्ये द्रव्यत्वापत्तिः। द्वितीये सम्बन्धानुपपत्तिः। किञ्च वि- नष्टे घटे सामान्यमवतिष्ठते विनश्यति स्थानान्तरं गच्छति- वा ? प्रथमे निराधारत्वापत्तिः, द्वितीये नित्यत्ववाचोयुक्त्ययुक्तिः, तृतीये द्रव्यत्वप्रसक्तिः, इत्यादि दूषणग्रस्तत्वात् सामान्य- मप्रमाणिकम् ॥ २७ ॥
२. बौद्ध दर्शन (माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक)
( २६ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ बौद्ध- दूषणान्तर भी देते हैं "किञ्चेति"-क्या सामान्यको सर्वगत अर्थात् सर्वत्र व्याप्त मानते हो या सामान्यका आश्रय यावत् व्यक्ति गत मानते हो? सर्वगत मानो तो घटमें भी पटत्वादि सामान्य रहेगा और पटमें घटत्वादि सामान्य रहेगा अतः समस्त वस्तुओंमें समस्त सामान्य रहनेसे साङ्कर्य दोष हो जायगा और सिद्धान्तकी हानि भी होगी। क्यों कि प्रशस्तपादाचार्यने स्वाश्रयत्वेन विवक्षित यावत् व्यक्तिगत माना है। अब दूसरे पक्षका खण्डन करते हैं "किञ्चेत्यादि"-एक घट मथुरामें विद्यमान है उसमें विद्यमान जो सामान्य है वह कालान्तरमे वृन्दावनमे उत्पन्न होनेवाले घटके साथ मथुरासे आकर सम्बद्ध होता है या वही रहकर सम्बद्ध होता है? आकरके संबद्ध होता है ऐसा कहो तो चलनक्रियाके आश्रय होनेसे द्रव्यत्व प्रसङ्ग होगा । क्रिया केवल द्रव्यहीमें रहती है अतएव "गुणादिर्निर्गुणक्रियः" इति । गुणक्रिया सामान्यादिको निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व कहा है। यदि नहीं आता हो तो देशभेद होनेसे परस्पर सम्बन्ध नहीं होसकेगा। और भी जब घट नष्ट होता है तब उस घटमे रहनेवाला सामान्य वही रहजाता है या दूसरी जगह चला जाता है अथवा नष्ट होजाता है ? प्रथम पक्षमे निराश्रय होगा । द्वितीय पक्षमे पूर्ववत् द्रव्यत्व प्रसङ्ग होगा । तृतीय पक्षमें अनित्यत्व प्रसङ्ग होगा । इत्यादि दूषण जालमें पतित होनेसे सामान्य कल्पना अप्रामाणिक है ॥ २७ ॥
- तदुक्तम्- "अन्यत्र वर्त्तमानस्य ततोऽन्यस्थानजन्मनि । तस्मादचलतः स्थानाद्वृत्तिरितियुक्तता ॥ यत्रासौ वर्त्तते भावस्तेन सम्बध्यते न तु । तद्देशिनश्च व्याप्नोति किमप्येतन्महाद्भुतम् ॥ न याति न च तत्रासीदस्ति पश्चान्न चांशवत् । जहाति पूर्वं नाधारमहो व्यसनसन्ततिः" इति ॥ अनुवृत्तप्रत्ययः किमालम्बन इति चेत् अङ्ग! अन्यापोहा- लम्बन एवेति सन्तोष्टव्यमायुष्मतेत्यलमतिप्रसङ्गेन ॥२८ [*] पूर्वोक्त अर्थको श्लोकरूपमें सप्रद् करके कहते हैं -“ अन्यत्रेत्यादि ” विद्यमान घटमें घटत्वरूप सामान्य मथुरासे चले विना पाटलिपुत्र में उत्पन्न घ होगा यहा बड़ी विलक्षण युक्ति है। एक ही घरमें ५ । १० घट हैं बीच बीचमे वस्तु भी हैं परन्तु घटत्वरूप सामान्य एक होकर सब घटोंमें व्याप्त रहता है मध्यमें वर्तमान दूसरे वस्तुओंम नहीं रहता यह भी बडे अचरजकी बात है ।
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। (२७) जब नया घट उत्पन्न होता है तब उसमे घटत्व दूसरे स्थानसे नहीं आता है न वहापर पहिले था। घट नष्ट होनेके पीछे भी वहा नहीं रहता और घटत्व सावयव भी नहीं है जिससे एक एक अंशसे एक एकमें व्याप्त कहें। पूर्व आधारको छोडता भी नहीं है ऐसी व्यसन- सन्ततिका कोई अन्त ही नहीं है। यदि सामान्य पदार्थ नहीं है तो प्रत्येक व्यक्तिमें अनुवृत्त "घटोऽयं घटोऽय" इत्यादि प्रतीति किमूलक है तो इसका उत्तर सावधानचि- त्तसे सुनो। अन्यका अभावरूप है अर्थात् घट यह प्रतीति पटाभावरूप है। हे आयुष्मान्! इतनेसे सन्तोष करो । अप्रामाणिक विचार इतने ही बहुत हैं ॥ २८ ॥ सर्वस्य ससारस्य दुःखात्मकत्वं सर्वतीर्थकरसम्मतम् । अ- न्यथा तन्निवर्त्तिविषूणां तेषां तन्निवृत्त्युपाये प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । तस्मात् सर्वं दुःखं दुःखमिति भावनीयम् । ननु किवदिति पृष्टे दृष्टान्तः कथनीय इति चेन्मैवं स्वलक्षणानां क्षणानां क्षणि- कतया सालक्षण्याभावात् नैतेन सदृशमपरमिति वक्तुमशक्य- त्वात् । ततः स्वलक्षणं स्वलक्षणमिति भावनीयम् । एवं शून्यं शून्यमित्यपिभावनीयम् ॥ २९ ॥ क्षणिकत्वका निरूपण करके क्रमशः दुःखत्वादिकका निरूपण करते हैं । "रुसार- स्येत्यादि" सम्पूर्ण संसार ही दुःखात्मक है इसको समस्त शास्त्रकारोने माना है । यदि संसार दुःखात्मक न होता तो शास्त्रकारोंकी दुःखनिवृत्तिके लिये और प्रकारके उपायोंकी प्रवृत्ति असंगत होजाती। अतः समस्त वस्तुओंको दुःखरूप ही जानो। संसारको दुःखात्मक कहनेमें कोई दृष्टान्त देना होगा सो भी नहीं क्योकि स्वलक्षण अर्थात् घटादि वस्तु जिस कालमें लक्षित (प्रतीत) होता हो वह स्वलक्षण क्षण कहाता है वह क्षण भी क्षणिक हैं। अतः अनेक वस्तुओंको एक समयमें ग्रहण न होनेके कारण अमुक वस्तुके सदृश घटादि वस्तु है ऐसा कहना असम्भव है। इस कारण स्वलक्षण २ ऐसी ही भावना करें एवं शून्य है शून्य है ऐसी भी भावना करे ॥ २९ ॥ • स्वप्ने जागरणे च न मया दृष्टमिदं रजतादीति विशिष्टनि- षेधस्योपलम्भात् । यदि दृष्टं सत् तदा तद्विशिष्टस्य दर्शन- स्येहन्ताया अधिष्ठानस्य च तस्मिन्नध्यस्तस्य रजतत्वादेस्तत्तत्- सम्बन्धस्यच समवायादेः सत्त्व स्यान्न चैतदिष्ट कस्यचिद्वा- दिनः। न चार्द्धजरतीयमुचितम् । न हि कुक्कुट्या एको भागः पाकाय अपरो भागः प्रसवाय कल्प्यतामिति कल्प्यते ॥ ३० ॥
( २८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध- क्षणिकत्वादि साधनेके अनन्तर शून्यत्ववादमें प्रमाण न होनेसे असंगत है ऐसी कोई शंका करे तो उसका परिहार करते हैं "स्वप्ने जागरणे चेत्यादि" जिस प्रकार स्वप्न दृष्ट रजतादि पदार्थ जाग्रत दशामें उपलब्ध न होनेसे शून्य हैं तिस प्रकार जागरण दशा में दृष्ट पदार्थ भी शून्य हैं स्वप्नमें दृष्ट वस्तुकी उपलब्धि न होनेसे असत् है परन्तु जागरणमें दृष्ट वस्तुकी उपलब्धि होनेसे दृष्टान्तके विषयम ऐसी आशंकासे कहते हैं- " यदि दृष्टेत्यादि " दृष्ट वस्तु सत् है तो ' इदं रजतं पश्यामीत्यादि " स्थलमे विशेषणीभूत इदन्ता, ( १ ) दर्शन ( २ ) रजतादिके आश्रय शुक्त्त्यादि ( ३ ) उसमे आरोपित रजतादि ( ४ ) तत्सम्बन्ध ( ५ ) सबका सत्त्व होगा परन्तु विशिष्ट का सत्त्व किसीको भी सम्मत नहीं है। केवल दृष्ट वस्तु मात्रका सत्त्व मानना अर्धजर तीय है आधा अंग बुढियाके समान और आधा अंग युवतिके समान है। मुर्गिके आधे अंगको काटकर पाक करे और आधे अंगके अण्डे पैदा करनेको रख छोडे ऐसा नहीं हो सकता ॥ ३० ॥ तस्मादध्यस्ताधिष्ठान तत्सम्बन्धदर्शनद्रष्टॄणां मध्ये एक- स्यानेकस्य वा असत्त्वे निषेधविषयत्वेन सर्व्वस्यासत्त्वं बला- दापतेदिति भगवतोपदिष्टे माध्यमिकास्तावदुत्तमप्रज्ञा इत्थम- चीकथन् । भिक्षुपादप्रसारणन्यायेन क्षणभंगाद्यभिधानमुखेन स्थायित्वानुकूलवदनीयत्वानुगतसर्व्वसत्यत्वभ्रमव्यावर्त्तनेन सर्व्वशून्यतायामेव पर्य्यवसानम् । अतस्तत्त्वं सदसदुभयानु- भवात्मकचतुष्कोटिविनिर्मुक्तं शून्यमेव । तथाहि-यदि घटादेः सत्त्वं स्वभावस्तर्हि कारकव्यापारवैयर्थ्यम् । असत्त्वं स्वभाव इति पक्षे प्राचीन एव दोषः प्रादुःष्यात् । यथोक्तम्-"न सत कारणापेक्षा व्योमादेरिव युज्यते । कार्य्यस्यासम्भवो हेतुः खपुष्पादेरिवासतः" इति ॥ ३१ ॥ अतः अधिष्ठान दर्शनादिके मध्यमें एक भी असत् होनेसे निषेधका विषय हो समस्त वस्तुओँकी निषेध विषयता अवर्जनीय है । अत बौद्धमतावलम्बी माध्यमिकलोग उक्त प्रकार समस्त वस्तुओको शून्य कहते हैं । "भिक्षुपादेति" जैसे किसी भिक्षुकके पै- मात्रका स्थान मिलनेपर वह भिक्षुक धीरे धीरे पांव पसारते जमीनपर दखल कर ले- ता है तैसे ही बुद्ध वचन क्षणिकत्वादि प्रदर्शनद्वारा सर्वशून्यत्व ही अभिमत सिद्धान्त पर्य्यवसि- त है। अतः सत्, असत्, सदसत्, तदुभयभिन्न रूप चार कोटिमे विलक्षण शून्य है, यह सिद्ध हुआ उसीको पूर्वपक्षद्वारा दृढ करते हैं "तथा ही त्यादि
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २९ ) क्या घटादिकों सत्स्वभाव है या असत् ? प्रथम पक्षमें कारक व्यापार व्यर्थ है क्यों कि गगनादिवत् सदा विद्यमानको कारणकी अपेक्षा नही होती है। असत्स्वभाव मानो तो भी कारकव्यापार व्यर्थ हैं जो गगन कुसुमके समान। असत् पदार्थको भी कारणकी अपेक्षा नहीं होती, वही शास्त्रकारोने कहा है "न सतः कारणा पेक्षा इत्यादि" सत् पदार्थको कारणकी अपेक्षा नहीं होती है जैसे आकाशको । अस- त्पदार्थ को भी कारणकी अपेक्षा नही होती है जैसे खपुष्पादिको ॥ ३१ ॥ विरोधादितरौ पक्षावनुपपन्नौ। तदुक्तं भगवता लंकावतारे-"बुद्ध्या विविच्यमानानां स्वभावो नावधार्य्यते । अतो निरभिलप्यास्ते निःस्वभावाश्च दर्शिताः" इति ॥ "इदं वस्तु बलायातं यद् वदन्ति विपश्चितः । यथा यथार्थाश्चिन्त्यन्ते विशीर्य्यन्ते तथा तथा" इति च॥ न काचिदपि पक्षे व्यवतिष्ठत इत्यर्थः । दृष्टार्थव्य- वहारश्च न स्वप्नव्यवहारवत् संवृत्त्या सङ्गच्छते ॥ अत एवो- क्तम् "परिव्राट् कामुकशुनामेकस्यां प्रमदात नौ कुणपं कामिनी भक्ष्य इति तिस्रो विकल्पनाः" इति ॥ तदेवं भावनाचतुष्टयव- शान्निखिलवासनानिर्वृत्तौ परनिर्वाणं शून्यरूपं सेत्स्यतीति वयं कृतार्थाः नास्माकमुपदेश्यं किञ्चिदस्तीति ॥ ३२ ॥ विरुद्ध होनेसे सदसत् और त्रितयभिन्न यह भी दो पक्ष अनुपपन्न हैं, क्यों कि घटको सदसत् मानते हो या सत् असत्-सदसत् एतत्रितय भिन्न मानते हो ? यदि सदसत मानो तो जो सत् है सो असत् नहीं कहसकते जैसे आकाश और जो असत् है वह सत् नही होसकता जैसे वन्ध्यासुत । यदि त्रितयभिन्न मानो तो भी आपसे पूछते हैं वह सत् है की असत् ? घटादिको असत् तो नहीं कहसकते हो क्योकि "सन् घट "ऐसी प्रतीति होती है सत् भी नहीं कह सकते, कारण कि भूत भविष्यत् वर्तमान कालत्रयंम जिसका बाध न हो वही सत् कहा जाता है जैसे घटावस्थाके पूर्व्व घटध्वंसके बाद और घटावस्थामें मृत्तिका रहती है इसलिये घटको सत् न कहकर मृत्तिका ही सत् कही जायगी इस कारण घटको त्रित्तयाभिन्न भी नही कहसकते । सिद्धान्तमे क्या मानते हो ऐसा प्रश्न करते हो तो सुनो लंकावतार ग्रन्थमें कहा है-"बुध्येति" अय भाव बुद्धिसे जिन पदार्थों, का विचार होसकता है उनके स्वभावका उपपादन नही होसकता इस कारण उनको शास्त्र- कारोंनें निरभिलप्य (दुरुपपाद)माना है । जब उनके स्वभावका कथन नही होसकता तब
( ३० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध- उनका स्वभाव है इसमे भी प्रमाण न होनेसे ये निःस्वभाव बतलाये गये हैं। " इद वस्त्विति"इसी बातको पंडित लोग छाती ठोकके कहते हैं कि जिस २ प्रकारसे पदार्थोंका निश्चय होता है उसीप्रकार वे पदार्थ नष्ट (रुपान्तरसे परिणत) भी देखे जाते हैं सदसद्भाति किसी पक्षमें व्यवस्थित ( ध्रुव ) नहीं है। दृष्ट वस्तु व्यवहार भी अज्ञानमूलक होनेसे स्वप्नवद्व्यवहारवत् असंगत है। एक ही स्त्रीके देहके विषयमे तीन तरहकी कल्पना होती है। जैसे परिव्राट् सन्न्यासी उसको मुर्दाके समान अस्पृश्य मानते हैं। कामी पुरुष उसको अतीव कामिनी और कुत्ता उसको खाद्य मांस मानते हैं। अब उपसहार करते हैं 'तदे व मित्यादि'-उक्त चतुर्विध भावनामे समस्त वासना निवृत्त होनेपर परम शान्तिरूप शून्य पद प्राप्त होगा अतः मैं कृतार्थ हूं मेरे लिये अब ज्ञातव्य कुछ भी नहीं है ॥ शिष्यैस्तावद्योगश्चाचारश्चेति द्वयं करणीयम्। तत्राप्राप्तस्यार्थ- स्य प्राप्तये पर्यनुयोगो योगः, गुरुक्तस्यार्थस्याङ्गीकरणमाचारः, गुरुक्तस्याङ्गीकरणादुत्तमाः, पर्यनुयोगस्याकरणादधमाश्च। अत- स्तेषां माध्यमिका इति प्रसिद्धिः। गुरुक्तभावनाचतुष्टयं बाह्या- र्थस्य शून्यत्वञ्चाङ्गीकृत्यान्तरस्य शून्यत्वञ्चाङ्गीकृतं कथमिति पर्यनुयोगस्य करणात् केषाञ्चिद् योगाचारप्रथा ॥ ३३ ॥ योगाचारादि संज्ञामे निमित्त दिखाते हैं "शिष्यैरित्यादि" शिष्योंको योग और आचार दोनों कर्त्तव्य हैं उसमें जो वस्तु अप्राप्त हैं उसकी प्राप्तिके लिये आग्रह करना योग है गुरूपदिष्टार्थको अङ्गीकार करना आचार है। गुरूपदिष्टार्थको स्वीकार करनेसे उत्तम हुए पर्यनुयोग (तर्क) न करनेसे अधम होगये उत्तमता और अधमता दोनों एक ही व्यक्तिमे रहनेसे वे मध्यम कहलाने लगे। मध्यमसिद्धान्तावलम्बी माध्यमिक रूपसे प्रसिद्ध हुए, गुरूपदिष्ट भावनाचतुष्टय और बाह्य विषयको शून्यत्व स्वीकार करके आन्तरिक विषयको शून्यत्व कैसे स्वीकार किया ऐसा प्रश्न करनेसे कोई २ योगाचार नामसे प्रसिद्ध होगये ॥ ३३ ॥ एषा हि तेषां परिभाषा। स्वयवेदनं तावदङ्गीकार्यमन्यथा जग- दान्ध्यं प्रसज्येत। तत् कीर्त्तितं धर्मकीर्त्तिना-"अप्रत्यक्षोपल- म्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिध्यति।" इति बाह्यं ग्राह्यं नोपपद्यत एव विकल्पानुपपत्तेः। अर्थो ज्ञानग्राह्यो भावादुत्पन्नो भवति अनु- त्पन्नो वा ? न पूर्व्वं, उत्पन्नस्य स्थित्यभावात्। नापरं, अनु- त्पन्नस्यासत्त्वात् ॥ ३४ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३१ ) योगाचार परिभाषा स्वसंवेदन (स्वयं स्वात्मप्रकाशक) ज्ञान अवश्य मानना होगा तो जगत्का आन्ध्य होगा अर्थात् समस्त व्यवहार लुप्त होजायगा । इस विषयमें पूर्वाचार्य- सम्मति भी देते हैं-“तत्कीतितमित्यादि”। जिसको प्रत्यक्ष उपलम्भ नहीं है उसको अर्थज्ञान नहीं होगा । बाह्यार्थका ज्ञानविषयत्व निराकरण कहते हैं । “बाह्यं ग्राह्यं नोपपद्यते इत्यादि” विकल्पसह उसको कहते हैं । ‘इदं वा इदं वा इत्यादि’ नाना प्रकारका तर्क होनेपर समी- चीन उत्तर द्वारा एक पक्षको भी स्थिर नहीं करसके । विकल्पको दिखाते हैं—“अर्थ इति” ज्ञानका विषय जो आपका अभिमत बाह्य अर्थ है वह कारण पदार्थसे उत्पन्न है या नहीं ? बिजलीकी चमकके समान उत्पन्न वस्तुकी स्थिति नहीं होसकनेसे प्रथम पक्ष असंगत है गगन कुसुमादिवत् अनुत्पन्न वस्तुकी सत्ता न होनेसे द्वितीयपक्ष भी असंगत है ॥३४॥ अथ मन्येथाः अतीत एवार्थो ज्ञानग्राह्यः तज्जनकत्वादिति तदपि बालभाषितं वर्त्तमानतावभासविरोधात् इन्द्रियादेरपि ग्राह्यत्वप्र- सङ्गाच्च ॥ ३५ ॥ उत्पन्न अर्थकी स्थिति न होनेपर भी-ज्ञानका जनक होनेसे अतीत अर्थ ज्ञानका ग्राह्य होगा ऐसा कहना भी बालकोंके कथनके समान है । क्यों कि यह घट है इस प्रकार सन्निहित विद्यमानत्वादि रूपसे जो प्रतीत होता है उसका विरोध होगा क्योंकि अतीतमें विद्यमानत्व नहीं है । ज्ञानजनकत्व इन्द्रिय मन आदिम भी होनेसे प्रत्यक्षज्ञानविषयत्व न्द्रियादिकमें भी अतिव्याप्त होगा इत्याशयसे कहते हैं-“अथ मन्येथा इत्यादि” ॥३५॥ किञ्च ग्राह्यः किं परमाणुरूपोऽर्थः अवयविरूपो वा ? न चरमः, कृत्स्नैकदेशविकल्पादिना तन्निराकरणात् ॥ ३६ ॥ प्रकारान्तरसे भी अवयवी द्रव्यनिराकरण पूर्वक बाह्य वस्तुको ज्ञानग्राह्यत्व निराकरण करते हैं-“किञ्चेत्यादि”परमाणु-रूप या-अवयवीरूप दो विकल्प हैं। अवयवी घटादि ज्ञानका विषय नहीं हो सकता क्यों कि अवयवी द्रव्य सिद्ध ही नहीं है । तथाहि परमाणु अवयव हुआ उसको परमाण्वन्तरसे संयोग मानोगे तो क्या वह एकदेशसे संयुक्त होता है या सर्व देशसे ? एकदेशपक्षमें परमाणु भी सावयव होगा, एक एक अवयवमें एक २ संयुक्त होता जायगा । यदि समस्तप्रदेशसे संयोग मानो तो पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व और अधर छ भागोंसे संयोग होनेपर द्व्यणुक भी परमाणुसे महत् न होगा एव क्रमसे त्र्यणुकादि परंपग भी परमाणुरूप ही रहेगा जब तक एक २ किनारेसे सम्बन्ध न होगा तबतक महत्व न होगा। किनारेसे मानो तो सावयव होगा उसीको कहते हैं- ‘कृत्स्नेत्यादि’ अभियुक्त वचन भी कहते हैं षट्क अर्थात् ऊर्ध्वादि भागोंसे एक कालमें सम्बन्ध होनेसे परमाणुके भी छ भाग (अवयव) होंगे यदि उसको निरवयव माने तो पिण्ड = घटादि अवयवी भी अणुरूप ही रहेगा ॥ ३६ ॥