सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१ ) पूर्व्वन्यायेन सहकारिसापेक्षस्य बीजस्य जनकत्वे सहकारि- सम्पाद्यबीजगतातिशयानवस्था प्रथमा व्यवस्थिता ॥ १९ ॥ अतिशयान्तरारम्भपक्षमे अनेक प्रकारकी अनवस्था भी है । अतिशयको उत्पन्न करनेके लिये पूर्व्यापेक्षा अन्य सहकारीकी अपेक्षा होगी उससे उत्पन्न दूसरा अतिशय पुनः तीसरे अतिशयको आरम्भ करेगा उसके लिये पुनः तीसरे सहकारीकी अपेक्षा इस क्रम से परम्परा बढती जायगी । यह एक प्रकारकी अनवस्था हुई । यथा अंकुरके लिये बीज कारण है क्षिति जल पवनादि सहकारी है तादृश सहकारी सम्मिलित होनेसे बीजमे जो अतिशय उत्पन्न होता है उसके लिये बीजको कारण मानना होगा । नहीं तो बीज न रहनेपर भी केवल सहकारीसे अतिशय उत्पन्न होने लगेगा, अतिशयको बीज धारण करता है परन्तु सहकारीके विना नहीं धारण कर सकता अतः सहकारीकी अपेक्षा होगी, नही तो उपकार ( अतिशय ) सदा बने रहनेसे अंकुर भी सदा उत्पन्न होने लगेगा ॥ अतः अतिशयके लिये अपेक्षित सहकारीसे बीजमे अतिशयान्तर अवश्य मानना होगा । उस अतिशयमे भी पुनः सहकारीकी अपेक्षा और बीजकी अपेक्षा एव क्रमसे सहकारी से सम्पाद्य बीजगत अतिशयकी अनवस्थारूप प्रथम अनवस्था हुई ॥ १९ ॥ अथोपकारः कार्यार्थमपेक्षमाणोऽपि बीजादिनिरपेक्ष कार्य्यं जनयति तत्सापेक्षो वा ? प्रथमे बीजादेरहेतुत्वमापतेत् । द्वितीये अपेक्ष्यमाणेन बीजादिना उपकारे अतिशय आधेय एव तत्र तत्रापीति बीजादिजन्यातिशयनिष्ठातिशयपरम्परापात इति द्वितीयानवस्था स्थिरा भवेत् । एवमपेक्ष्यमाणेनोपकारेण बीजा- द्वैर्धर्मिण्युपकारान्तरमाधेयमित्युपकाराधेयबीजातिशयाश्रया- तिशयपरम्परापात इति तृतीयानवस्था दुरवस्था स्यात् ॥२०॥ अंकुरादि कार्य्यके लिये अपेक्षित उपकार ( अतिशय ) क्या बीजादिके निर १ होकर स्वयं अंकुरादिको उत्पन्न करता है या बीजादिके सापेक्ष होकर करता है निरपेक्ष ने तो बीजादिका कारण न होनेसे व्यर्थ हो जायेंगे । सापेक्ष कहे तो अपेक्षित बीजादि उपकारमे अतिशय आधान करेगा । उनमें पुनः अतिशयान्तर उत्पन्न होगा उसके ये बीजान्तरकी अपेक्षा होगी । पुनरपि एव इस क्रमसे बीजादिसे जायमान जो अतिशय समे पुनः अतिशय कर उसमें भी अतिशय इत्यादि दूसरी अनवस्था भी स्थिर होगी । सी प्रकार अपेक्षित उपकारसे बीजादि धर्मी ( आश्रयमे ) भी उपकारान्तर मानना