भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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'( २४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध-

अतीतानागत प्रयोजन क्रियाके लिये असमर्थ है, वही प्रसङ्ग है । जो पदार्थ ( बीजा दि ) जिस कालमें जिस कार्यको करता है वह उस कार्यम समर्थ है । जिस प्रकार जल पवनादि सामग्री स्वकार्योत्पादनमें समर्थ है । अतीतअनागत कालम यह भी बीजादि तत्तत्कालवर्त्ती अर्थक्रियाको उत्पादन करते हैं । यही प्रसङ्गव्यत्यय अर्थात् प्रसङ्गाभाव रूप विपर्यय है । अतः विपक्ष ( स्थिरपक्ष ) में क्रम यौगपद्य न होनेसे व्यापकाभावसे गृहीत व्यतिरेकव्याप्ति प्रसङ्ग तद्विपर्ययमे गृहीत अन्वयव्याप्तिका जो सत्त्व है वह क्षणि कत्व पक्षमें ही उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ २३ ॥

  • तदुक्तं ज्ञानश्रिया- " यत्सत्तत्क्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी सत्ता शक्तिरिहार्थकर्मणि मितेः सिद्धेषु सिद्धा न सा ॥ नाप्येकैव विधान्यथा परकृतेनापि क्रियादिर्भवेद् द्वेधापिक्षणभङ्गसङ्गतिरतः साध्ये च विश्राम्यति" इति ॥ २४॥ ज्ञानश्रीनामक बौद्धोंके आचार्यने कहा है । जो वस्तु सत् है वह क्षणिक है जिस प्रकार जलधर । घटादि भाव भी सत् है अतः वह भी क्षणिक होगा । सत्तारूप जो शक्ति है वह अर्थक्रियाकारित्व है । यह मिति-( प्रमाण ) से सिद्ध होता है । वह शक्ति सिद्ध अर्थात् ( स्थिर ) पदार्थ में सिद्ध नही होसकती । "नाप्येकैवेति" अक्षणिकसे कार्योंत्पत्तिमें एक ही प्रकार नहीं किन्तु क्रम और अक्रम दो प्रकार है। अन्यथा अन्यकी कृतिसे अन्यमें क्रिया दर्शनस्पर्शनादि होने लगेगा। क्रम अक्रम दोनों पक्षमें क्षण भङ्गत्व सिद्ध होते हैं* ॥ २४ ॥ न च कणभक्षाक्षचरणादिपक्षकक्षीकारेण सत्तासामान्ययोगि- त्वमेव सत्त्वमिति मन्तव्यं सामान्यविशेषसमवायानामसत्त्व- प्रसङ्गात् ॥ २५ ॥ आगे सामान्यखण्डनका उपक्रम करते ह-"नच कणभक्षेति'। कणभक्ष-औलूक्य है यह बाल्यावस्थाम कपोत वृत्तिको धारणकर मार्गम गिरे हुए अन्नके कणोंको बीनकर
  • यदि कोई शङ्का करे कुशूलादिमें एवं अङ्कुरादिमें प्रयोजनरूप क्रियाजनकत्व है क्योंकि कुशूल घटादि कार्यको करता है बीजादि अङ्कुरादि कार्यको करता है परन्तु घटादिम अर्थक्रियाकारित्व क्या है ? तिसका उत्तर-घटादिमें भी जलहरणादि प्रधानक्रियानिर्वाहकत्व है अतएव विषयता सम्बन्धसे ज्ञानक्रिया कारित्व सर्वत्र है। यह भी समझना आवश्यक है कि शास्त्रकृत् लोग शास्त्रविचारके समय किसी वस्तुका देना होता है तब घटपटादि वस्तुका नाम लेते हैं-परन्तु प्राचीनलोग ऐस समयपर नीलपीतादिका नाम लेते
  • यह नीलादि वर्णवाची नही किन्तु घटादि वस्तुमात्रका उपलक्षण है ॥