भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २५ ) निर्वाह करते रहे अतः उनका नाम कणाद (कणभक्ष) हुआ। उलूक ऋषिके अपत्य (पुत्र) होनेसे औलूक्य नाम हुआ। उनका शास्त्र वैशेषिक है। अक्षपाद गौतम हैं। इनका न्यायशास्त्र है। इनके मतमें व्यक्तिसे अतिरिक्त सामान्य (जाति) एक पदार्थ है- उस सामान्यमें दो भेद हैं, पर और अपर। द्रव्य गुण, कर्म, इन तीनोंमें रहनेवाला परसा- मान्य है उसीको सत्ता सामान्य कहते हैं। तथा च तादृशसत्ता सामान्यवत्त्व ही सत्त्व है- अर्थ क्रियाकारित्व सत्त्व नहीं ऐसा नहीं मान सकते सामान्य, विशेष, समवायपर सामान्य न होनेसे उनका असत्त्वप्रसग होगा। कहा भी है-"सामान्यपरहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मता" इति-॥ २६ ॥ न च तत्र स्वरूपसत्तानिबन्धनः सव्यवहारः, प्रयोजकगौरवा- पत्तेः, अनुगतत्वाननुगतत्वविकल्पपराहतैश्च, सर्षपमहीधरा- दिषु विलक्षणेषु क्षणेष्वनुगतस्याकारस्य मणिषु सूत्रवद् भूतग- णेषु गुणवच्चाप्रतिभासनाच्च ॥ २६ ॥ यदि कहो उसमें सद् व्यवहार स्वरूपसत्ता (विद्यमानता) मूलक है जातिमूलक नहीं तो कही २ सद्व्यवहार प्रयोजिकासत्तासामान्य, कहीं २ स्वरूपसत्ता होगी तो भिन्नभिन्न प्रयोजक कल्पनाका गौरव होगा। कहा कहा अनुगत है कहा अननुगत है यह व्यवस्था भी न होगी। जिस प्रकार नाना पुष्परचित मालाके अन्तर्गत प्रत्येक पुष्पो सें सूत्र प्रविष्ट रहता है, जिस प्रकार पृथिव्यादि द्रव्योंमें गुण विद्यमान रहता है, तिसी प्रकार पर्वत सर्षपादि विलक्षण वस्तुओंम अनुगत सामान्यका प्रतिभास (प्रत्यक्ष) भी नहीं होता ॥ २६ ॥ किञ्च सामान्यं सर्वगतं स्वाश्रयसर्वगतं वा ? प्रथमे सर्ववस्तुसं- करप्रसङ्गः, अपसिद्धान्तापत्तिश्च । यतः प्रोक्त प्रशस्तपादेन-स्व विषयसर्वगतमिति। किञ्च विद्यमाने घटे वर्त्तमानं सामान्यमन्यत्र जायमानेन सम्बध्यमान तस्मादागच्छत्सम्बध्यते अनागच्छ- द्वा ? आद्ये द्रव्यत्वापत्तिः। द्वितीये सम्बन्धानुपपत्तिः। किञ्च वि- नष्टे घटे सामान्यमवतिष्ठते विनश्यति स्थानान्तरं गच्छति- वा ? प्रथमे निराधारत्वापत्तिः, द्वितीये नित्यत्ववाचोयुक्त्ययुक्तिः, तृतीये द्रव्यत्वप्रसक्तिः, इत्यादि दूषणग्रस्तत्वात् सामान्य- मप्रमाणिकम् ॥ २७ ॥