सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ बौद्ध- दूषणान्तर भी देते हैं "किञ्चेति"-क्या सामान्यको सर्वगत अर्थात् सर्वत्र व्याप्त मानते हो या सामान्यका आश्रय यावत् व्यक्ति गत मानते हो? सर्वगत मानो तो घटमें भी पटत्वादि सामान्य रहेगा और पटमें घटत्वादि सामान्य रहेगा अतः समस्त वस्तुओंमें समस्त सामान्य रहनेसे साङ्कर्य दोष हो जायगा और सिद्धान्तकी हानि भी होगी। क्यों कि प्रशस्तपादाचार्यने स्वाश्रयत्वेन विवक्षित यावत् व्यक्तिगत माना है। अब दूसरे पक्षका खण्डन करते हैं "किञ्चेत्यादि"-एक घट मथुरामें विद्यमान है उसमें विद्यमान जो सामान्य है वह कालान्तरमे वृन्दावनमे उत्पन्न होनेवाले घटके साथ मथुरासे आकर सम्बद्ध होता है या वही रहकर सम्बद्ध होता है? आकरके संबद्ध होता है ऐसा कहो तो चलनक्रियाके आश्रय होनेसे द्रव्यत्व प्रसङ्ग होगा । क्रिया केवल द्रव्यहीमें रहती है अतएव "गुणादिर्निर्गुणक्रियः" इति । गुणक्रिया सामान्यादिको निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व कहा है। यदि नहीं आता हो तो देशभेद होनेसे परस्पर सम्बन्ध नहीं होसकेगा। और भी जब घट नष्ट होता है तब उस घटमे रहनेवाला सामान्य वही रहजाता है या दूसरी जगह चला जाता है अथवा नष्ट होजाता है ? प्रथम पक्षमे निराश्रय होगा । द्वितीय पक्षमे पूर्ववत् द्रव्यत्व प्रसङ्ग होगा । तृतीय पक्षमें अनित्यत्व प्रसङ्ग होगा । इत्यादि दूषण जालमें पतित होनेसे सामान्य कल्पना अप्रामाणिक है ॥ २७ ॥
- तदुक्तम्- "अन्यत्र वर्त्तमानस्य ततोऽन्यस्थानजन्मनि । तस्मादचलतः स्थानाद्वृत्तिरितियुक्तता ॥ यत्रासौ वर्त्तते भावस्तेन सम्बध्यते न तु । तद्देशिनश्च व्याप्नोति किमप्येतन्महाद्भुतम् ॥ न याति न च तत्रासीदस्ति पश्चान्न चांशवत् । जहाति पूर्वं नाधारमहो व्यसनसन्ततिः" इति ॥ अनुवृत्तप्रत्ययः किमालम्बन इति चेत् अङ्ग! अन्यापोहा- लम्बन एवेति सन्तोष्टव्यमायुष्मतेत्यलमतिप्रसङ्गेन ॥२८ [*] पूर्वोक्त अर्थको श्लोकरूपमें सप्रद् करके कहते हैं -“ अन्यत्रेत्यादि ” विद्यमान घटमें घटत्वरूप सामान्य मथुरासे चले विना पाटलिपुत्र में उत्पन्न घ होगा यहा बड़ी विलक्षण युक्ति है। एक ही घरमें ५ । १० घट हैं बीच बीचमे वस्तु भी हैं परन्तु घटत्वरूप सामान्य एक होकर सब घटोंमें व्याप्त रहता है मध्यमें वर्तमान दूसरे वस्तुओंम नहीं रहता यह भी बडे अचरजकी बात है ।