भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। (२७) जब नया घट उत्पन्न होता है तब उसमे घटत्व दूसरे स्थानसे नहीं आता है न वहापर पहिले था। घट नष्ट होनेके पीछे भी वहा नहीं रहता और घटत्व सावयव भी नहीं है जिससे एक एक अंशसे एक एकमें व्याप्त कहें। पूर्व आधारको छोडता भी नहीं है ऐसी व्यसन- सन्ततिका कोई अन्त ही नहीं है। यदि सामान्य पदार्थ नहीं है तो प्रत्येक व्यक्तिमें अनुवृत्त "घटोऽयं घटोऽय" इत्यादि प्रतीति किमूलक है तो इसका उत्तर सावधानचि- त्तसे सुनो। अन्यका अभावरूप है अर्थात् घट यह प्रतीति पटाभावरूप है। हे आयुष्मान्! इतनेसे सन्तोष करो । अप्रामाणिक विचार इतने ही बहुत हैं ॥ २८ ॥ सर्वस्य ससारस्य दुःखात्मकत्वं सर्वतीर्थकरसम्मतम् । अ- न्यथा तन्निवर्त्तिविषूणां तेषां तन्निवृत्त्युपाये प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । तस्मात् सर्वं दुःखं दुःखमिति भावनीयम् । ननु किवदिति पृष्टे दृष्टान्तः कथनीय इति चेन्मैवं स्वलक्षणानां क्षणानां क्षणि- कतया सालक्षण्याभावात् नैतेन सदृशमपरमिति वक्तुमशक्य- त्वात् । ततः स्वलक्षणं स्वलक्षणमिति भावनीयम् । एवं शून्यं शून्यमित्यपिभावनीयम् ॥ २९ ॥ क्षणिकत्वका निरूपण करके क्रमशः दुःखत्वादिकका निरूपण करते हैं । "रुसार- स्येत्यादि" सम्पूर्ण संसार ही दुःखात्मक है इसको समस्त शास्त्रकारोने माना है । यदि संसार दुःखात्मक न होता तो शास्त्रकारोंकी दुःखनिवृत्तिके लिये और प्रकारके उपायोंकी प्रवृत्ति असंगत होजाती। अतः समस्त वस्तुओंको दुःखरूप ही जानो। संसारको दुःखात्मक कहनेमें कोई दृष्टान्त देना होगा सो भी नहीं क्योकि स्वलक्षण अर्थात् घटादि वस्तु जिस कालमें लक्षित (प्रतीत) होता हो वह स्वलक्षण क्षण कहाता है वह क्षण भी क्षणिक हैं। अतः अनेक वस्तुओंको एक समयमें ग्रहण न होनेके कारण अमुक वस्तुके सदृश घटादि वस्तु है ऐसा कहना असम्भव है। इस कारण स्वलक्षण २ ऐसी ही भावना करें एवं शून्य है शून्य है ऐसी भी भावना करे ॥ २९ ॥ • स्वप्ने जागरणे च न मया दृष्टमिदं रजतादीति विशिष्टनि- षेधस्योपलम्भात् । यदि दृष्टं सत् तदा तद्विशिष्टस्य दर्शन- स्येहन्ताया अधिष्ठानस्य च तस्मिन्नध्यस्तस्य रजतत्वादेस्तत्तत्- सम्बन्धस्यच समवायादेः सत्त्व स्यान्न चैतदिष्ट कस्यचिद्वा- दिनः। न चार्द्धजरतीयमुचितम् । न हि कुक्कुट्या एको भागः पाकाय अपरो भागः प्रसवाय कल्प्यतामिति कल्प्यते ॥ ३० ॥