भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( २८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ बौद्ध- क्षणिकत्वादि साधनेके अनन्तर शून्यत्ववादमें प्रमाण न होनेसे असंगत है ऐसी कोई शंका करे तो उसका परिहार करते हैं "स्वप्ने जागरणे चेत्यादि" जिस प्रकार स्वप्न दृष्ट रजतादि पदार्थ जाग्रत दशामें उपलब्ध न होनेसे शून्य हैं तिस प्रकार जागरण दशा में दृष्ट पदार्थ भी शून्य हैं स्वप्नमें दृष्ट वस्तुकी उपलब्धि न होनेसे असत् है परन्तु जागरणमें दृष्ट वस्तुकी उपलब्धि होनेसे दृष्टान्तके विषयम ऐसी आशंकासे कहते हैं- " यदि दृष्टेत्यादि " दृष्ट वस्तु सत् है तो ' इदं रजतं पश्यामीत्यादि " स्थलमे विशेषणीभूत इदन्ता, ( १ ) दर्शन ( २ ) रजतादिके आश्रय शुक्त्त्यादि ( ३ ) उसमे आरोपित रजतादि ( ४ ) तत्सम्बन्ध ( ५ ) सबका सत्त्व होगा परन्तु विशिष्ट का सत्त्व किसीको भी सम्मत नहीं है। केवल दृष्ट वस्तु मात्रका सत्त्व मानना अर्धजर तीय है आधा अंग बुढियाके समान और आधा अंग युवतिके समान है। मुर्गिके आधे अंगको काटकर पाक करे और आधे अंगके अण्डे पैदा करनेको रख छोडे ऐसा नहीं हो सकता ॥ ३० ॥ तस्मादध्यस्ताधिष्ठान तत्सम्बन्धदर्शनद्रष्टॄणां मध्ये एक- स्यानेकस्य वा असत्त्वे निषेधविषयत्वेन सर्व्वस्यासत्त्वं बला- दापतेदिति भगवतोपदिष्टे माध्यमिकास्तावदुत्तमप्रज्ञा इत्थम- चीकथन् । भिक्षुपादप्रसारणन्यायेन क्षणभंगाद्यभिधानमुखेन स्थायित्वानुकूलवदनीयत्वानुगतसर्व्वसत्यत्वभ्रमव्यावर्त्तनेन सर्व्वशून्यतायामेव पर्य्यवसानम् । अतस्तत्त्वं सदसदुभयानु- भवात्मकचतुष्कोटिविनिर्मुक्तं शून्यमेव । तथाहि-यदि घटादेः सत्त्वं स्वभावस्तर्हि कारकव्यापारवैयर्थ्यम् । असत्त्वं स्वभाव इति पक्षे प्राचीन एव दोषः प्रादुःष्यात् । यथोक्तम्-"न सत कारणापेक्षा व्योमादेरिव युज्यते । कार्य्यस्यासम्भवो हेतुः खपुष्पादेरिवासतः" इति ॥ ३१ ॥ अतः अधिष्ठान दर्शनादिके मध्यमें एक भी असत् होनेसे निषेधका विषय हो समस्त वस्तुओँकी निषेध विषयता अवर्जनीय है । अत बौद्धमतावलम्बी माध्यमिकलोग उक्त प्रकार समस्त वस्तुओको शून्य कहते हैं । "भिक्षुपादेति" जैसे किसी भिक्षुकके पै- मात्रका स्थान मिलनेपर वह भिक्षुक धीरे धीरे पांव पसारते जमीनपर दखल कर ले- ता है तैसे ही बुद्ध वचन क्षणिकत्वादि प्रदर्शनद्वारा सर्वशून्यत्व ही अभिमत सिद्धान्त पर्य्यवसि- त है। अतः सत्, असत्, सदसत्, तदुभयभिन्न रूप चार कोटिमे विलक्षण शून्य है, यह सिद्ध हुआ उसीको पूर्वपक्षद्वारा दृढ करते हैं "तथा ही त्यादि