भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २९ ) क्या घटादिकों सत्स्वभाव है या असत् ? प्रथम पक्षमें कारक व्यापार व्यर्थ है क्यों कि गगनादिवत् सदा विद्यमानको कारणकी अपेक्षा नही होती है। असत्स्वभाव मानो तो भी कारकव्यापार व्यर्थ हैं जो गगन कुसुमके समान। असत् पदार्थको भी कारणकी अपेक्षा नहीं होती, वही शास्त्रकारोने कहा है "न सतः कारणा पेक्षा इत्यादि" सत् पदार्थको कारणकी अपेक्षा नहीं होती है जैसे आकाशको । अस- त्पदार्थ को भी कारणकी अपेक्षा नही होती है जैसे खपुष्पादिको ॥ ३१ ॥ विरोधादितरौ पक्षावनुपपन्नौ। तदुक्तं भगवता लंकावतारे-"बुद्ध्या विविच्यमानानां स्वभावो नावधार्य्यते । अतो निरभिलप्यास्ते निःस्वभावाश्च दर्शिताः" इति ॥ "इदं वस्तु बलायातं यद् वदन्ति विपश्चितः । यथा यथार्थाश्चिन्त्यन्ते विशीर्य्यन्ते तथा तथा" इति च॥ न काचिदपि पक्षे व्यवतिष्ठत इत्यर्थः । दृष्टार्थव्य- वहारश्च न स्वप्नव्यवहारवत् संवृत्त्या सङ्गच्छते ॥ अत एवो- क्तम् "परिव्राट् कामुकशुनामेकस्यां प्रमदात नौ कुणपं कामिनी भक्ष्य इति तिस्रो विकल्पनाः" इति ॥ तदेवं भावनाचतुष्टयव- शान्निखिलवासनानिर्वृत्तौ परनिर्वाणं शून्यरूपं सेत्स्यतीति वयं कृतार्थाः नास्माकमुपदेश्यं किञ्चिदस्तीति ॥ ३२ ॥ विरुद्ध होनेसे सदसत् और त्रितयभिन्न यह भी दो पक्ष अनुपपन्न हैं, क्यों कि घटको सदसत् मानते हो या सत् असत्-सदसत् एतत्रितय भिन्न मानते हो ? यदि सदसत मानो तो जो सत् है सो असत् नहीं कहसकते जैसे आकाश और जो असत् है वह सत् नही होसकता जैसे वन्ध्यासुत । यदि त्रितयभिन्न मानो तो भी आपसे पूछते हैं वह सत् है की असत् ? घटादिको असत् तो नहीं कहसकते हो क्योकि "सन् घट "ऐसी प्रतीति होती है सत् भी नहीं कह सकते, कारण कि भूत भविष्यत् वर्तमान कालत्रयंम जिसका बाध न हो वही सत् कहा जाता है जैसे घटावस्थाके पूर्व्व घटध्वंसके बाद और घटावस्थामें मृत्तिका रहती है इसलिये घटको सत् न कहकर मृत्तिका ही सत् कही जायगी इस कारण घटको त्रित्तयाभिन्न भी नही कहसकते । सिद्धान्तमे क्या मानते हो ऐसा प्रश्न करते हो तो सुनो लंकावतार ग्रन्थमें कहा है-"बुध्येति" अय भाव बुद्धिसे जिन पदार्थों, का विचार होसकता है उनके स्वभावका उपपादन नही होसकता इस कारण उनको शास्त्र- कारोंनें निरभिलप्य (दुरुपपाद)माना है । जब उनके स्वभावका कथन नही होसकता तब