सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध- उनका स्वभाव है इसमे भी प्रमाण न होनेसे ये निःस्वभाव बतलाये गये हैं। " इद वस्त्विति"इसी बातको पंडित लोग छाती ठोकके कहते हैं कि जिस २ प्रकारसे पदार्थोंका निश्चय होता है उसीप्रकार वे पदार्थ नष्ट (रुपान्तरसे परिणत) भी देखे जाते हैं सदसद्भाति किसी पक्षमें व्यवस्थित ( ध्रुव ) नहीं है। दृष्ट वस्तु व्यवहार भी अज्ञानमूलक होनेसे स्वप्नवद्व्यवहारवत् असंगत है। एक ही स्त्रीके देहके विषयमे तीन तरहकी कल्पना होती है। जैसे परिव्राट् सन्न्यासी उसको मुर्दाके समान अस्पृश्य मानते हैं। कामी पुरुष उसको अतीव कामिनी और कुत्ता उसको खाद्य मांस मानते हैं। अब उपसहार करते हैं 'तदे व मित्यादि'-उक्त चतुर्विध भावनामे समस्त वासना निवृत्त होनेपर परम शान्तिरूप शून्य पद प्राप्त होगा अतः मैं कृतार्थ हूं मेरे लिये अब ज्ञातव्य कुछ भी नहीं है ॥ शिष्यैस्तावद्योगश्चाचारश्चेति द्वयं करणीयम्। तत्राप्राप्तस्यार्थ- स्य प्राप्तये पर्यनुयोगो योगः, गुरुक्तस्यार्थस्याङ्गीकरणमाचारः, गुरुक्तस्याङ्गीकरणादुत्तमाः, पर्यनुयोगस्याकरणादधमाश्च। अत- स्तेषां माध्यमिका इति प्रसिद्धिः। गुरुक्तभावनाचतुष्टयं बाह्या- र्थस्य शून्यत्वञ्चाङ्गीकृत्यान्तरस्य शून्यत्वञ्चाङ्गीकृतं कथमिति पर्यनुयोगस्य करणात् केषाञ्चिद् योगाचारप्रथा ॥ ३३ ॥ योगाचारादि संज्ञामे निमित्त दिखाते हैं "शिष्यैरित्यादि" शिष्योंको योग और आचार दोनों कर्त्तव्य हैं उसमें जो वस्तु अप्राप्त हैं उसकी प्राप्तिके लिये आग्रह करना योग है गुरूपदिष्टार्थको अङ्गीकार करना आचार है। गुरूपदिष्टार्थको स्वीकार करनेसे उत्तम हुए पर्यनुयोग (तर्क) न करनेसे अधम होगये उत्तमता और अधमता दोनों एक ही व्यक्तिमे रहनेसे वे मध्यम कहलाने लगे। मध्यमसिद्धान्तावलम्बी माध्यमिक रूपसे प्रसिद्ध हुए, गुरूपदिष्ट भावनाचतुष्टय और बाह्य विषयको शून्यत्व स्वीकार करके आन्तरिक विषयको शून्यत्व कैसे स्वीकार किया ऐसा प्रश्न करनेसे कोई २ योगाचार नामसे प्रसिद्ध होगये ॥ ३३ ॥ एषा हि तेषां परिभाषा। स्वयवेदनं तावदङ्गीकार्यमन्यथा जग- दान्ध्यं प्रसज्येत। तत् कीर्त्तितं धर्मकीर्त्तिना-"अप्रत्यक्षोपल- म्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिध्यति।" इति बाह्यं ग्राह्यं नोपपद्यत एव विकल्पानुपपत्तेः। अर्थो ज्ञानग्राह्यो भावादुत्पन्नो भवति अनु- त्पन्नो वा ? न पूर्व्वं, उत्पन्नस्य स्थित्यभावात्। नापरं, अनु- त्पन्नस्यासत्त्वात् ॥ ३४ ॥