भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३१ ) योगाचार परिभाषा स्वसंवेदन (स्वयं स्वात्मप्रकाशक) ज्ञान अवश्य मानना होगा तो जगत्का आन्ध्य होगा अर्थात् समस्त व्यवहार लुप्त होजायगा । इस विषयमें पूर्वाचार्य- सम्मति भी देते हैं-“तत्कीतितमित्यादि”। जिसको प्रत्यक्ष उपलम्भ नहीं है उसको अर्थज्ञान नहीं होगा । बाह्यार्थका ज्ञानविषयत्व निराकरण कहते हैं । “बाह्यं ग्राह्यं नोपपद्यते इत्यादि” विकल्पसह उसको कहते हैं । ‘इदं वा इदं वा इत्यादि’ नाना प्रकारका तर्क होनेपर समी- चीन उत्तर द्वारा एक पक्षको भी स्थिर नहीं करसके । विकल्पको दिखाते हैं—“अर्थ इति” ज्ञानका विषय जो आपका अभिमत बाह्य अर्थ है वह कारण पदार्थसे उत्पन्न है या नहीं ? बिजलीकी चमकके समान उत्पन्न वस्तुकी स्थिति नहीं होसकनेसे प्रथम पक्ष असंगत है गगन कुसुमादिवत् अनुत्पन्न वस्तुकी सत्ता न होनेसे द्वितीयपक्ष भी असंगत है ॥३४॥ अथ मन्येथाः अतीत एवार्थो ज्ञानग्राह्यः तज्जनकत्वादिति तदपि बालभाषितं वर्त्तमानतावभासविरोधात् इन्द्रियादेरपि ग्राह्यत्वप्र- सङ्गाच्च ॥ ३५ ॥ उत्पन्न अर्थकी स्थिति न होनेपर भी-ज्ञानका जनक होनेसे अतीत अर्थ ज्ञानका ग्राह्य होगा ऐसा कहना भी बालकोंके कथनके समान है । क्यों कि यह घट है इस प्रकार सन्निहित विद्यमानत्वादि रूपसे जो प्रतीत होता है उसका विरोध होगा क्योंकि अतीतमें विद्यमानत्व नहीं है । ज्ञानजनकत्व इन्द्रिय मन आदिम भी होनेसे प्रत्यक्षज्ञानविषयत्व न्द्रियादिकमें भी अतिव्याप्त होगा इत्याशयसे कहते हैं-“अथ मन्येथा इत्यादि” ॥३५॥ किञ्च ग्राह्यः किं परमाणुरूपोऽर्थः अवयविरूपो वा ? न चरमः, कृत्स्नैकदेशविकल्पादिना तन्निराकरणात् ॥ ३६ ॥ प्रकारान्तरसे भी अवयवी द्रव्यनिराकरण पूर्वक बाह्य वस्तुको ज्ञानग्राह्यत्व निराकरण करते हैं-“किञ्चेत्यादि”परमाणु-रूप या-अवयवीरूप दो विकल्प हैं। अवयवी घटादि ज्ञानका विषय नहीं हो सकता क्यों कि अवयवी द्रव्य सिद्ध ही नहीं है । तथाहि परमाणु अवयव हुआ उसको परमाण्वन्तरसे संयोग मानोगे तो क्या वह एकदेशसे संयुक्त होता है या सर्व देशसे ? एकदेशपक्षमें परमाणु भी सावयव होगा, एक एक अवयवमें एक २ संयुक्त होता जायगा । यदि समस्तप्रदेशसे संयोग मानो तो पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व और अधर छ भागोंसे संयोग होनेपर द्व्यणुक भी परमाणुसे महत् न होगा एव क्रमसे त्र्यणुकादि परंपग भी परमाणुरूप ही रहेगा जब तक एक २ किनारेसे सम्बन्ध न होगा तबतक महत्व न होगा। किनारेसे मानो तो सावयव होगा उसीको कहते हैं- ‘कृत्स्नेत्यादि’ अभियुक्त वचन भी कहते हैं षट्क अर्थात् ऊर्ध्वादि भागोंसे एक कालमें सम्बन्ध होनेसे परमाणुके भी छ भाग (अवयव) होंगे यदि उसको निरवयव माने तो पिण्ड = घटादि अवयवी भी अणुरूप ही रहेगा ॥ ३६ ॥