सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध- न प्रथमः, अतीन्द्रियत्वात् षट्केन युगपद्योगर बाधक- त्वाच्च । यथोक्तम्-“षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता । तेषां मप्येकदेशत्व पिण्डः स्यादणुमात्रकः” इति ॥ ३७ ॥ परमाणु पक्ष भी दूषित करते हैं “न प्रथमेति” परमाणुको अतीन्द्रिय = अप्रत्यक्ष मानते हैं - परमाणु उसको कहते हैं - जो प्रातःकाल - गवाक्ष (झरोखा) द्वारा सूर्य की किरणें घरके भीतर - प्रवेश होनेपर सूक्ष्म रज देखपडते हैं उसको त्रसरेणु कह- ते हैं उसमें तीन द्वयणुक हैं एक द्वयणुकमे दो अणु होते हैं अणु और परमाणु दोनों पर्यायशब्द हैं । तथा च उक्त त्रसरेणुका षष्ठ भाग परमाणु है- कोई कोई साठमें भाग को परमाणु कहते हैं वह उक्त क्रमविरुद्ध होनेसे नैयायिकसिद्धान्तके अज्ञानमूलक हैं नैयायिकोंने दृश्यमानसूक्ष्म रजको त्रिसरेणु माना है इसी अभिप्रायसे कहा है- “जालान्तरे गते भानौ सूक्ष्मं यद्दृश्यते रजः । तस्य षष्ठो विभास्तु परमाणुः प्रकीर्तितः” इति ॥ ३७ ॥ तस्मात् स्वव्यतिरिक्तग्राह्यविरहात्तदात्मिका बुद्धिः स्वयमेव स्वात्मरूपप्रकाशिका प्रकाशवदितिसिद्धम् । तदुक्तम्-“नान्योऽ- नुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः । ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात् स्वय सैव प्रकाशत.” इति ॥ ३८ ॥ उपसंहार “तस्मादिति” ज्ञानसे अतिरिक्त ग्राह्य न होनेसे ज्ञानात्मक बुद्धि को स्वय स्वकीय रूपका दीपादि प्रकाशवत् प्रकाश करती है । इसमे प्रमाण भी कहते हैं “तदुक्तमिति’ बुद्धिसे अनुभाव्य अन्य वस्तु नहीं है बुद्धिका अन्य कोई अनुभव है भी नहीग्राह्यग्राहकशुन्य होनेसे स्वयमेव प्रकाशवती बुद्धि है ॥ ३८ ॥ ग्राह्यग्राहकयोरभेदश्चानुमातव्यः । यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न भिद्यते यथा ज्ञानेनात्मा। वेद्यन्ते तैश्च नीलादयः। भेदे हि सत्य- धुना अनेनार्थस्य सम्बन्धित्व न स्यात् तादात्म्यस्य नियम- हेतोरभावात्तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् यश्चाय ग्राह्यग्राहकसंवि- त्तीनां पृथगवभास । स एकस्मिंश्चन्द्रमसि द्वित्वावभास इव भ्रमः । अत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्रवाहभेदवासनेव निमित्तम्॥३९॥ वेद्यवेदकका अभेद विनाप्रमाण सिद्ध न होगा इसलिये कहते हैं-“ग्राह्यग्राहकयोरिति” ग्राह्य घटादि द्वारा मन दोनोंका वेद्य अर्थात, ग्राह्यके अतिरिक्त वस्तुका अभाव