सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ९ ) साधनाव्यापकत्वरूप विशेषण चरितार्थ हुआ । साध्यव्यापकत्व नहीं कहते तो घट त्वमें अतिव्याप्ति होगी-क्या कि घटत्व घटमात्रहीमे रहेगा कार्यत्व अनित्य वस्तुमात्र में रहेगा अतः साधनाव्यापकत्व होगया साध्यव्यापक करते हैं तो घटत्व अनित्यत्वका व्यापक नहीं हुआ सम नहीं कहते तो अश्रावणत्वमें अतिव्याप्ति होगी साधनका अव्या पक और साध्यका व्यापक भी अश्रावणत्व है साध्य सम कहते हैं तो साध्य समनियत व्याप्ति नहीं हुई क्योकि अश्रावणत्व अनित्यत्वरूप साध्य अन्यत्र नित्य आकाशादिम भी रहता है । “ वह्निमान् धूमात् ” इत्यादिम आर्द्वेन्धनसंयोगरूप उपाधिम साधना- व्यापकत्व साध्यसमव्यापकत्व होनेसे लक्षणसमन्वय हुआ ॥ १८ ॥ तस्मादिदमनवद्य समासमेत्यादिनोक्तमाचार्यैश्चेति ॥ १९ ॥ उक्तार्थम आचार्यसम्मति कहते हैं कि समासमेति - “समासमाविनाभाववेकत्र स्तो यदा तदा । समेन यदि नो व्याप्तस्तयोहीनोऽप्रयोजकः” इति ॥ व्याप्ति दो प्रकारकी है एक समव्याप्ति और दूसरी असमव्याप्ति यथा गन्धवत्त्व पृथिवीत्व दोनोंकी परस्पर व्याप्ति सम व्याप्ति है । दोनामे से एक की व्याप्ति हो दूसरेकी नहीं हो वह असमव्याप्ति है यथा वह्निधूमकी व्याप्ति धूमकी वह्निके साथ व्याप्ति है किन्तु वह्निकी धूमके साथ व्याप्ति नहीं क्यो कि तप्त लोहपिण्डमें अग्नि है धूम नहीं । अविनाभावका अर्थ व्याप्ति है सम व्याप्ति और असमव्याप्ति दोनों एकस्थल में हो तो सम और असम अर्थात् धूम और अग्निके मध्यमे ही न अर्थात् असम अग्नि समधूमके साथ यदि व्याप्त न हो अर्थात् अग्नि धूमसे व्याप्त न हो तो हीन अग्नि अप्रयोजक अर्थात् धूमरूप साध्यका हेतु नहीं होसकती ॥ १९ ॥ तत्र विध्यध्यवसायपूर्वकत्वान्निषेधाध्यवसायस्योपाधिज्ञाने जाते तदभावविशिष्टसम्बन्धरूप व्याप्तिज्ञानं व्याप्तिज्ञानाधीन चोपा- धिज्ञानमिति परस्पराश्रयवज्रप्रहारदोषो वज्रलेपायते। तस्मादवि- नाभावस्य दुर्बोधतया नानुमानाद्यवकाशः। धूमादिज्ञानानन्त- रमग्न्यादिज्ञाने प्रवृत्तिः प्रत्यक्षमूलतया भ्रान्त्या वा युज्यते ॥२०॥ उक्त अन्योन्याश्रयको उपपादन करते हैं तत्रेत्यादिसे- ऐसा नियम है कि अभावज्ञानम प्रतियोगीज्ञान कारण होता है एव निषेधज्ञानम मे विधिज्ञान कारण होनेसे उपाधिज्ञान होनेपर उपाधिभाव सहित व्याप्ति ज्ञान होगा व्याप्ति ज्ञानानन्तर उपाधिज्ञान इति अन्योन्याश्रय दोष भी अपरिहरणीय है । अन्यो- न्याश्रयका लक्षण “स्वज्ञानाधीनज्ञानवत्त्व” है स्वपदसे उपाधिके अभावका ग्रहण है उसके