भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ३६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [बौद्ध- अथ समाधान करते हैं (तदयुक्तमिति) जब बाह्य अर्थ ही नहीं तो घटाकाशस्थ उत्पत्ति न होनेसे ज्ञानको वहिर्वत् ऐसा उपमानोपमेयभाव कथन भी अयुक्त है वसुमित्र वन्ध्यापुत्रके समान सुन्दर है ऐसा कोई बुद्धिमान नहीं कहत है भेदज्ञान भ्रान्तिसिद्ध होनेसे अभेद ज्ञानको प्रामाण्य होगा अभेद ज्ञानका प्रामाण्य होनेसे भेद ज्ञानमें भ्रान्तत्व होगा इस प्रकारसे अन्योन्याश्रय होगा प्रत्युत लोक निर्वि- वाद रूपसे बाह्य नीलादि विषयको ही स्वीकारकर आन्तरिक वस्तुकी ही उपेक्षा करते हैं अत अभेदसाधक युक्ति गोशृङ्गकी सींगके समान कथनमात्र है वहिर्वत् ऐसे उपमानवाक्यको कहनेवाले स्वयं बाह्यवस्तुकी भावस्वीकार करके पुनः बाह्यपर निषेध करनेपर आप अपने ही बाणसे मारे जायंगे । अर्थात् सर्वांश वाक्यमें ही बाह्यार्थ सिद्ध होता है ॥ ४४ ॥ ननु ज्ञानाभिन्नकालस्यार्थस्य बाह्यत्वमनुपपन्नमिति चेत्तदनुपप- न्नम्। इन्द्रियसन्निकृष्टस्य विषयस्योत्पाद्ये ज्ञाने स्वाकारस- मर्पणकतया समर्पितेन चाकारेण तस्यार्थस्यानुमेयतोपपत्ते । अतएव पर्य्यनुयोगपरिहारौ समग्राहिषाताम्–“ भिन्नकाल कथं ग्राह्यमिति चेत् ग्राह्यतां विदु । हेतुत्वमेव च व्यक्ते- र्ज्ञानाकारार्पणक्षमम्॥” इति। तथाच, यथा पुष्ट्या भोजनमनुमी- यते यथा च भाषया देशः यथा वा सम्भ्रमेण स्नेह तथा ज्ञाना- कारेण ज्ञेयमनुमेयम् । तदुक्तम् “अर्थेन घटयत्येनां नहि मुक्त्वा- ऽर्थरूपताम् । तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता ॥” इति । नहि वित्तिसत्तैव तद्वेदनायुक्ता तस्या सर्वत्राविशेषात् । तान्तु सारूप्यमाविशत् सरूपयितुं घटयेदिति च ॥ ४५ ॥ (ननु-इति) ज्ञानसे अर्थका प्रतिभास होता है अतः ज्ञानसे अतिरिक्त कालमें अर्थका बाह्यत्व अनुपपन्न है ऐसा कथनही अनुपपन्न है क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय और विष- यको सन्निकर्षसे उत्पादनीय ज्ञानम विषयको आकारका आरोप होना कहा है “ अर्थेनैव विशेषो हि निराकारतया धियाम्” ॥ इति । अन्यथा ज्ञानमें विशेष हीन होगा अत अर्पित आकारसे बाह्यका अनुमान होसक्ता है + । एतद्विषयक आक्षेप

  • अनुमान स्वरूप यह है 'बाह्य वस्तु सत्, ज्ञाने स्वाकार समर्प कत्वात् । य स्वाकार समर्पक स आरोपाधिकरणातिरिक्त सत्तावान् भवति यथा स्फटिके लौहित्याकारसमर्पक- जपाकुसुम स्फटिकभिन्न सदेव ' इत्यादि ।