भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ३७ ) परिहारकाभी सग्रह भिन्नकालेत्यादिसे किया है ज्ञान ही ग्राहक हे अत जिस कालमें ज्ञान न हो उस कालका ग्रहण कौन करेगा ज्ञानमे विषय अपने स्वरूपको आरोप करता हे इस लिये स्वाकार समर्पक स्वरूप हेतुसे वाह्यका ग्रहण होसकता है । अत' 'देवदत्त स्थूल है' यहा भोजनके विना स्थूलत्व अनुपपन्न होनेसे जिस प्रकार भोज- नका अनुमान होता है उसी प्रकार ज्ञानसे स्वाकारसमर्पक वाह्य वस्तुकाभी अनु- मान होगा. यथा-भाषासे देशका अनुमान होता है । यथा किसीके वियोगसे संभ्रम देखकर स्नेहका अनुमानुमान होता है तथा ज्ञानका आकारसे ज्ञेयका अनुमान होता है (अधनेति) ज्ञान जब साकार है तो उसको दो अश हुए आकार और आकारी जाकार विषयसे ही आरोपित होता है अत' अर्थ विषय समर्पित आकारको छोड- कर केवल निराकारज्ञान नहीं उपपन्न होगा इस कारण विषयसिद्धिमे ज्ञानका प्रमेयाकारवत्त्व ही प्रमाण है ( नहीति) केवल ज्ञानमात्रमे विषयप्रतिभास नही होस- कता क्योकि ऐसा होनेसे घटपटादिसवेदनमें विशेष ही नहीं होगा वस्तु भेदसे ही ज्ञानमें विशेषता होती है जो स्वरूप प्रविष्ट होता है तदाकार ही रूप सघटित होता है ॥ ४५ ॥ तथाच-वाह्यार्थसद्भावे प्रयोगः ये यस्मिन् सत्यपि कादाचित्का- ते सर्वे तदतिरिक्तसापेक्षाः । यथा अविवक्षति अजिगमिषति मयि वचनगमनप्रतिभासा विवक्षुजिगमिषुरुषान्तरसन्तानसा- पेक्षा तथाच विवादाध्यासिताः प्रवृत्तिप्रत्यया सत्यप्यालयवि- ज्ञाने कदाचिदेव, नीलाद्युल्लेखना इति ॥ ४६ ॥ बाह्यार्थसद्भावमें अनुमानका प्रयोग दिखाते हैं जिसके रहनेपरभी जो वस्तु कदा- चित् रहती है वह उससे अतिरिक्त वस्तुको सापेक्ष होता है । जैसे नहीं बोलनेके और न जानेकी इच्छा करनेवालेके विषयमें वचन और गमनका प्रतिभास विवक्षु और जिगमिषु पुरुषान्तर सन्तान सापेक्ष है विवादग्रस्त प्रवृत्तिविज्ञान आलयविज्ञान रहनेपर भी कदाचित् ही नीलाद्याकारमे प्रकाशित होता है अत वहभी विज्ञानमे अति- रिक्त वस्तु सापेक्ष है ॥ ४६ ॥ तत्रालयविज्ञानं नामाहमास्पदं विज्ञानं, नीलाद्युल्लेिख च प्रवृत्ति- विज्ञानम् । यथोक्तम्- “तत् स्यादालयविज्ञानं यद् भवेदन्तरता दम् । तत् स्यात् प्रवृत्तिविज्ञानं यन्नीलादिकमल्लिो । नचात्र तस्मादालयविज्ञानसन्तानातिरिक्तः कश्चार्थः। यथा प्रतीत्यसमु