सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआग्रद्दवाले दूसरे शिष्यसे विज्ञान ही सत् हे यह कहा उभयको सत्य माननेवाले तीसरे शिष्यने विज्ञेय अनुमेय हे ऐसा कहा तब चतुर्थ शिष्यने उनकी परस्पर विरुद्ध भाषा बताई इस कारण वह वैभाषिक संज्ञासे प्रसिद्ध होगया सामान्यत यह उनका सिद्धान्त हे विज्ञेयको अनुमेय मानोगे तो व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होगी व्याप्ति ग्रह प्रत्यक्षदृष्टि हीमें होगा प्रत्यक्षदृष्ट वस्तु अनुमेयवादीके मतमें न होनेसे व्याप्ति ग्रहका स्थल न होनेसे अनुमानकी प्रवृत्ति न होगी अनुमान न होनेपर समस्त लोकव्यव- हार भी विरुद्ध होंगे इस लिये ग्राह्य ओर अध्यवसाय भेदसे अर्थ दो प्रकार मानने होंगे ॥ ५५ ॥ तत्र ग्रहणं निर्विकल्पकरूपं प्रमाणं कल्पनापोढत्वात् । अध्यव- साय सविकल्पकरूपोऽप्रमाणं कल्पनाज्ञानत्वात् । तदुक्तम्- "कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम् । विकल्पो वस्तुनिर्भा- सादसंवादादुपप्लव ॥" इति । "ग्राह्यं वस्तुप्रमाणं हि ग्रहणं यदि- तोऽन्यथा । न तद्वस्तु न तन्मानं शब्दलिङ्गेन्द्रियादिजम् " ॥ इति च ॥ ५६ ॥ ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) निर्विकल्पक अर्थात् प्रकार विशेष्य ससर्ग आदि शून्य ही प्रमाण है । नाम रूप जात्यादिका नाम कल्पना है उससे रहित कल्पनापोढ है । अध्यवसाय सविकल्पकरूप है यथा अय घट इत्यादि वह अप्रमाण है उक्तार्थमें प्राचीन सम्मति कहते हैं (कल्पनेत्यादि) कल्पनारहित ओर भ्रमरहित निर्विकल्पक प्रत्यक्ष प्रमाण हे निर्विवाद जात्यादिविशिष्ट वस्तुप्रकाश उपप्लव ( भ्रम ) है यदि प्रमाणसिद्ध ग्राह्य हो तो उस वस्तुसे पृथक ग्रहण भी प्रमाण होगा । यद्वा ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) प्रमाण हो तो ग्राह्य पदार्थ भी अवश्य होगा अन्यथा जो शब्द लिङ्ग इन्द्रियादिसे प्रतीयमान ग्राह्यातिरिक्त हो तो वह न वस्तु हे ओर न प्रमाण ही हे जो वस्तुका ग्रहण नही करसकता है ॥ ५६ ॥ ननु सविकल्पकस्याप्रामाण्ये कथं ततः प्रवृत्तस्यार्थप्राप्ति सं- वादश्चोपपद्येयातामिति चेन्न तद्भद्रं मणिप्रभाविवयमणिविकल्प- न्यायेन पारम्पर्येणार्थप्रतिलम्भसम्भवेन तदुपपत्ते । अव- शिष्टं सौत्रान्तिकप्रस्तावे प्रपञ्चितमिति नेह प्रतन्यते ॥ न च विनेयाशयानुरोधेनोपदेशभेदः साम्प्रदायिको न भवतीति भणि-