भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् [ भाषाटीकासमेत. ] ( ४६) तव्यम् । यतो भणितं बोधिचित्तविवरणे ॥ “देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगा । विद्यन्ते बहुधा लोके उपायैर्बहुभि किल ॥ गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा. । भिन्ना हि देशना- ऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा ॥ ” इति ॥ ५७ ॥ ( ननु इति ) सविकल्पक यदि प्रमाण ही नही तो जब घट इत्यादि सविकल्पक ज्ञानसे प्रवृत्तको वस्तु प्राप्ति और निर्विवाद व्यवहार कैसे होते हैं बहुत अच्छा प्रश्न हे इसका उत्तर सुनो मणियोंकी प्रभाको देखकर मणिभ्रमसे प्रवृत्त पुरुषको परम्प रासे जिस प्रकार मणिप्राप्त होता है तद्वत् परम्परासे वस्तुकी प्राप्ति होजाती है शेष सौत्रान्तिक सिद्धान्तके अनुसार ही है एक ही आचार्यका शिष्य भेद होनेसे भिन्न २ रूपसे उपदेश करना सम्प्रदायविरुद्ध होगा क्योंकि उपदेशभेद होनेसे सिद्धान्तभेद अवश्य हो जायगा इस आशयसे कहते है ( न च विनेयभेदेत्यादि ) ( देशनेति ) लोकनाथ जगतके स्वामी अर्थात् बुद्धदेवजीका उपदेश प्राणियोंकी बुद्धिके अनु- सार होता है, कुछ सिद्धान्तभेदसे नही अधिकारीके भेद होनेसे केवल उपायमात्रका भेद है । लोकमें भी एक ही प्राप्य वस्तुके लिये अनेक उपाय होते हैं । ( गम्भी- रोति ) गम्भीर ( उत्तम ) उत्तान ( अधम ) उभयलक्षण ( मध्यम ) भेदसे भिन्न है. यह अधिकारीके बुद्धिका तारतम्य है, परन्तु सब मतके सिद्धान्त केवल एक शून्यतत्त्वमें है ॥ ५७ ॥ द्वादशायतनपूजा श्रेयस्करीति बौद्धनये प्रसिद्धम् “अर्थानु- पार्य बहुशो द्वादशायतनानि वै । परित पूजनीयानि किम- न्यैरिह पूजितैः ॥ ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा कर्मेन्द्रियाणि च । मनो बुद्धिरिति प्रोक्तं द्वादशायतनं बुधैः " इति ॥ ५८ ॥ बौद्धसिद्धान्तमें श्रोत्रादि द्वादशस्थानकी पूजा ही श्रेयस्कर प्रसिद्ध है, उसीको दिखाते हैं, ( अर्थानित्यादि ) प्रचुर धनको उपार्जन करके द्वादश आयतनकी भलीभाँतिसे पूजा करे संसारमें अन्यपूजन सब विफल है । श्रोत्र, चक्षु, घ्राण त्वक्, रसना यह पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पायु, पाणि, पाद, उपस्थ, वाक रूप पाच कर्मे- न्द्रिय, मन और बुद्धि इन्हीका ज्ञानी लोग द्वादशायतन कहते हैं ॥ ५८ ॥ विवेकविलासे बौद्धमतमित्थमभ्यधायि “बौद्धानां सुगतो देवो विश्वं च क्षणभङ्गुरम् । आर्य्यसत्त्वाख्यया तत्त्वचतुष्टयमिदं