भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भापाटीकासमेत. । ( ४७ ) सिद्धान्तवादी बौद्ध हे वैभाषिक ज्ञानसे युक्त ( बाह्य ) अर्थको नही मानते हे सौत्रा- न्तिक ज्ञानग्राह्य बाह्य अर्थको नहीं मानते योगाचारके मतमें विषयाकारयुक्त बुद्धिमात्र है माध्यमिक लोग शुद्ध संवित्को ही मानते हैं । उक्त चारोंके मतोंमें रागादि ज्ञानसन्तानकी वासनाकी उच्छेद ही मुक्तिहै कृत्तिः ( चर्म मृगछाला आदि ) १ कमण्डलु २ शिरका सशिख मुण्डन ३ चीर ४ दिनका भोजन अर्थात् रात्रिमें भोजन नहीं करना ५ सघ अर्थात् दो चारके साथ रहना ६ रक्तवस्त्र धारण करना इतने बौद्धसन्यासियोंके चिह्न हैं ॥ ६० ॥ इति सर्वदर्शनसङ्ग्रहे बौद्धदर्शन समाप्तम् । अथार्हतदर्शनम् । तदित्थ मुक्तकच्छानां मतमसहमाना विवसनाः कथञ्चित् स्था- यित्वमास्थाय क्षणिकत्वपक्षं प्रतिक्षिंपन्ति याद्यात्मा कश्चिन्ना- स्थीयेत स्थायी तदा लौकिकफलसाधनसम्पादनं विफलं भवेत् । न ह्येतत् सम्भविष्यति अन्यः करोत्यन्यो भुङ्क इति । तस्माद्योऽहं प्राक् कर्माकरवं सोऽहं सम्प्रति तत्फलं भुञ्जे इति. पूर्वापरकालानुयायिनः स्थायिनस्तस्य स्पष्टप्रमाणावसिततया पूर्वापरभागविकलकालकलावस्थितिलक्षणक्षणिकतां परीक्ष- कैरर्हद्भिर्न परिग्राह्या ॥ १ ॥ पूर्वोक्त क्षणिकत्व शून्यवादिरूप मुक्तकच्छ ( बौद्ध ) के मतको न सहनेवाले विवेसन ( नग्न ) स्थिरत्व मानकर क्षणिकत्व पक्षका निराकरण करते हैं यदि आत्मा- को स्थिर नहीं माने तो पशु अन्नादि फलसाधन समस्त लोकव्यवहार भी विफल होजायेंगे क्योंकि आत्मा क्षणिक होनेसे क्रियाके उत्तरकाल हीमें नष्ट होपायगा कालान्तरभावी फलोत्पत्तिकालमें आत्मा नहीं यह भी सम्भव नहीं कि कर्म कोई करे फल दूसरे भोगें जो मैंने पहिले कर्म किया उसका फल मै भोगता हू इस प्रकार प्रत्यभिज्ञांस पूर्वोत्तर कालसम्बन्धी स्थायी आत्मा स्पष्ट प्रतीत होता है अतः पूर्वोत्तरभागशून्य कलात्मके कालस्थितिरूप क्षणिकत्व तर्ककुशलोंके अनादर- णीय है ॥ १ ॥ १ कच्छ न लगाना बौद्ध सन्यासियोंमें नग्न रहना दिगम्बर जैन सन्यासियोंमें प्रसिद्ध है ।