सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४८) सर्वदर्शनसंग्रहः । [अर्हत- अथ मन्येथाः "प्रमाणबलादायातः प्रवाहः केन वार्य्येत" इति न्यायेन यत् सत् तत् क्षणिकमित्यादिना प्रमाणेन क्षणिक- तायाः प्रमिततया तदनुसारेण समानवर्त्तिनामेव प्राचीनः प्रत्ययः कर्मकर्त्ता उत्तरः प्रत्ययः फलभोक्ता ॥ न चातिप्रसङ्गः कार्य्य- कारणभावस्य नियामकत्वात् । यथा मधुररसभावितानामाम्र- बीजानां परिकल्पितायां भूमावुप्तान्यामङ्कुरकाण्डस्कन्धशाखाप- ल्लवादिषु तद्द्वारा परम्परया फले माधुर्य्यनियमः, यथा वा ला- क्षारसावसिक्तानां कार्पासबीजादीनामङ्कुरादिपारम्पर्येण कार्पा- सादौ रक्तिमनियमः । यथोक्तम्- "यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता कर्मवासना । फलं तत्रैव बध्नाति कार्पासे रक्तता यथा ॥ कुसुमे बीजपूरादेर्यल्लाक्षाद्युपसिच्यते । शक्तिराधीयते तत्र काचित्तां किं न पश्यसि॥" इति ॥ २ ॥ बौद्धमतसे पूर्वपक्ष (अथोते) नहि सिद्धेऽनुपपन्नं नामेति न्यायसे यत्सत् तत् क्ष- णिकमिति अनुमान प्रमाणसिद्ध क्षणिकत्व प्रवाहको कौन वारण करसकता है अत पूर्वक्षणवृत्ति विज्ञानात्माको कर्त्ता और उत्तरक्षणवृत्तिको फलभोक्ता मानने पड़ेगा यदि पूर्वोत्तरक्षणवृत्तित्वमात्रसे कर्तृत्वभोक्तृत्वव्यवस्था करोगे तो देवदत्तका किया हुआ कर्मका फल यज्ञदत्तको प्राप्त होने लगेंगे क्योंकि पूर्वोत्तरक्षणवृत्तित्व दोनोंमें समान ही है इस आशयसे शंका करते हैं (नचोते) अतिप्रसङ्ग अतिव्याप्ति (उत्तर) (कार्यकारणेति) पूर्वकालवृत्ति विज्ञानात्मा उत्तरविज्ञानका कारण है और उत्तरविज्ञान का कार्य है उसमें भी यद्वृत्तिवासनासे जो उत्पन्न होता है उन दोनों विज्ञानमें पर- स्पर कार्यकारण भाव है तथाच कार्यकारणभाव ही कर्तृत्व और भोक्तृत्वका नियामक होगा अर्थात् कारण विज्ञानात्मवृत्तिक्रियाजन्यफलके कार्यविज्ञानात्मा भोगेगा एवञ्च उक्त अतिप्रसंग नहीं होगा जिस प्रकार मधुर रससे भावित आम्रबीजको अच्छी जोती हुई भूमिमें रोपनेपर अङ्कुर, स्तम्भ, स्कन्ध, शाखा, पत्र और पुष्पादि परम्परासे मधुर फल उत्पन्न होता है खट्ट बीजसे उत्पन्न फल खट्टा होता है और भी लाक्षार्क रससे भिगोया हुआ कपासका बीज अङ्कुरादि परम्परासे कपासमें रक्तवर्ण उत्पन्न करता है उसी प्रकार आत्मामें भी वासनासन्तान परम्परासे फलभोग नियम होनायगा । अभियुक्तोक्ति भी कहते हैं (यथोक्तमिति) जिस आत्माके वासना (संस्कार)