सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । सन्तानमें कर्मवासना सक्रान्त हो उसमें उस कर्मका फल होता है जिस प्रकार कपासमें रक्तता होती है । ( कुसुमेति ) बीजपूर अर्थात् बिजोरानीम्बूके पुष्पमें लाक्षादिके जलसे भिजानेपर रूपान्तर रसान्तर गन्धान्तरादिको उत्पन्न करनेवाली जो शक्ति होती है उसी प्रकार आत्मसन्तानमे भी होगी यही तात्पर्य है ॥ २ ॥ तदपि काशकुशावलम्बनकल्पं विकल्पासहृत्वात् ॥ जलध- रादौ दृष्टान्ते क्षणिकत्वमनेन प्रमाणेन प्रमितं प्रमाणान्तरेण वा । नाद्यः, भवदभिमतस्य क्षणिकत्वस्य क्वचिदप्यदृष्टचर- त्वेन दृष्टान्तसिद्धावस्थानुमानस्याद्युत्थानात् । न द्वितीय , तेनैव न्यायेन सर्वत्र क्षणिकत्वसिद्धौ सत्त्वानुमानवैफल्यापत्तेः, अर्थक्रियाकारित्वं सत्त्वमित्यङ्गीकारे मिथ्यासर्पदंशादेरपि अर्थक्रियाकारित्वेन सत्त्वापाताच्च । अतएवोक्तम्-उत्पाद- व्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति ॥ ३ ॥ उक्त पूर्वपक्षका उत्तर-( तदपीति ) यह भी जलमें डूबते हुएको कुशाका अव- लम्वन करना है । क्योंकि वक्ष्यमाण विकल्पमे एक भी पक्षको स्थिर नही कर सकता । तथाहि यत् सत् तत् क्षणिक यथा जलधर इस अनुमानमें दृष्टान्तभूतजल- धरमें क्षणिकत्व इसी अनुमानसे साधना है या प्रमाणान्तरसे सिद्ध है ? प्रथमपक्षको नहीं कहसकते क्योकि दृष्टान्त वही होता है जो सिद्ध और उभयवादीसम्मत हो आपका अभिमत ( अनेकक्षणवृत्तित्वे सति कालवृत्तित्वरूप ) क्षणिकत्व कहीं भी दृष्ट नही जाता अत दृष्टान्त न होनेसे इस प्रकारका अनुमानका उत्थान ही असम्भव हे । यदि अनुमानान्तरसे कही तो उसी अनुमानसे सर्वत्र क्षणिकत्व सिद्ध होही जायगा पुन यत्सद्दिति सत्त्वानुमानान्तरकल्पनाप्रयास भी व्यर्थ है । अर्थक्रिया ( फलजनकक्रिया ) कारित्वरूप सत्त्वका लक्षण भी अयुक्त है क्योंकि मिथ्यासर्पका काटना भी तादृशज्ञान भयादिरूप अर्थक्रियाकारी होनेसे उसको भी सत्यत्वप्रसङ्ग होगा । अतएव तत्त्वार्थसूत्रमें उत्पादेत्यादि सत्त्वका लक्षण कहा है इसका अर्थ यह हे कि चेतन या अचेतन द्रव्यको सजातीय भावान्तरापत्ति उत्पाद है जैसे मृत्पिण्डका घटरूप परिणाम पूर्वावस्थाका त्याग व्यय है यथा घटोत्पत्तिमें पिण्डका नाश अनादिपरिणाम स्वभाव होनेसे स्थिरता ध्रुव है यथा मृत्पिण्ड घटाद्य वस्थामें मृत्का सम्बन्ध तयाच तादृश त्रितययुक्त द्रव्य है ॥ ३ ॥ ४