भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ५० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- अथोच्येत सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्माध्यासात् तत्सिद्धि- रिति तदसाधु स्यात् । स्याद्वादिनामनेकान्तानादस्यैतयोरपि विरोधासिद्धे । यदुक्तं कार्पासादिवृष्टान्त इति तदुक्तिमात्रं युक्ते- रनुक्तेः तत्रापि निरन्वयनाशस्यानङ्गीकाराच्च ॥ न च सन्तानिव्यतिरेकेण सन्तान प्रमाणपदवीमुपारोढुमर्हति । तदु- क्तम्—'सजातीया क्रमोत्पन्ना प्रत्यासन्ना परस्परम् । व्यक्त- यस्तासु सन्तानः स चैक इति गीयते ॥” इति ॥ ४ ॥ ( अथेति ) वर्तमान अर्थक्रिया सम्पादन कालमें अतीतानागत अर्थक्रियाको बीजादि नहीं करता अतः विरुद्धधर्माध्यस्त होनेसे “बीजादयः प्रतिक्षणं भिन्ना विरु- द्धधर्माध्यस्तत्वादित्यादि” अनुमानसे भी वस्तुका क्षणिकत्व सिद्ध हे यह भी कथन अयुक्त है स्याद्वादीके मतसे सर्वत्र अनेकान्त अर्थात् अस्ति नास्तीति विरुद्ध- धर्माध्यस्तत्व ही रहता है अतः उनके मतमें विरोध असिद्ध हे कर्तृत्वभोक्तृत्वादि प्रति नियमके लिये जो कार्पास दृष्टान्त दिया वह भी निर्युक्तिक होनेसे कथनमात्र है बीजादिकमे भी निरन्वय ध्वंस नहीं होता। तात्पर्य यह है कि, कार्यका ध्वंस कारणा- वस्थाप्राप्ति है । निरन्वय अर्थात् निरुपाख्य अभावरूप नहीं यथा घटका ध्वंस होकर कपालरूप होगया तब भी उसमें मृत्तिका रहती है कपाल नष्ट होकर पिण्ड या चूर्ण होनेपर भी मृत्तिकारूप व्यवहार बना रहता है अतः अवयी मृत सत्य ही रहता है यदि कहो यद्यपि घटादिके ध्वंसमे अन्वयी मृदादि बनी रहती है तथापि बीजादिमें एव तप्तलोहम छोडी हुई जलबिन्दुमे अन्वयी नही उपलब्ध होता हे यहभी नहीं वहा पर भी घटादि दृष्टान्तसे अनुमान किया जाता है अनुमानस्वरूप अङ्कुरादि अनुवर्तमान बीजादि अन्वयी रूपह्य है कार्य होनेसे घटके समान तप्त- लोहम नष्ट जल भी तेजके वेगसे मेघमण्डलमें अथवा सूर्यमण्डलमें जाता है ऐसा अनुमान करना होगा अत अन्वयीका विनाश न होनेसे निरन्वय विनाश कही नहीं होता हे । अतएव “उदाविन्दौ च सिन्धौ च तोयभावो न भिद्यते । विनष्टेऽपि ततो विन्दौवास्ति तस्यान्वयोऽम्बुधौ ॥” इत्यादि सङ्गत होता है ॥ ४ ॥ न च कार्यकारणभावनियमोऽतिप्रसङ्गं भक्तुमर्हति । तथाहि उपाध्यायबुद्धद्यनुभूतस्य शिष्यबुद्धि स्मरेत तदुपचितकर्मफ- लमनुभवेद्वा तथा च कृतप्रणाशाकृताभ्यागमप्रसङ्ग । तदुक्तं

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