सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- अतः ज्ञानवैचित्र्यके लिये क्षणिकत्व पक्षमें भी कथञ्चित् विषयाकार समर्पकत्व स्वीकार करना चाहिये इस आशङ्कासे कहते हैं (निराकारज्ञान वादऽपीति) तात्पर्य साकार- ज्ञानवादमें विषय नष्ट होनेपर भी घटपाटादिरूप नियत आकारको ग्रहण करता है अर्थात् घटज्ञान घटकेही आकारका ग्रहण करता है पट आकारको नही ग्रहण करता यह व्यवस्था जिस प्रकार होती है उसी प्रकार निराकार ज्ञानवादमें भी नियम हो जायगा अत साकारत्व मानना भी व्यर्थ हे ॥ ६ ॥ तथा हि-प्रत्यक्षेण विषयाकाररहितमेव ज्ञानं प्रतिपुरुषमहमित्या- क्या घटादिज्ञानमनुभूयते न तु दर्पणादिवत् प्रतिबिम्बक्रान्तम् । विषयाकारधारित्वे ज्ञानस्यार्थे दूरनिकटादिव्यवहाराय जला- ञ्जलिर्वितर्येत । न चेदमिष्टापादनमेष्टव्यं दवीयान् महीधरो नेदीयान् दीर्घो बहुरिति व्यवहारस्य निराबाधं जागरूकत्वात् । न चाकाराधायकस्य तस्य दवीयस्त्वादिशालितया तथा व्य- वहार इति कथनीयं दर्पणादौ नथानुप्लम्भात् ॥ ७ ॥ उसीको उपपादन करते है ( तथाहीति ) प्रत्यक्षसे जो ज्ञान होता है वह घटा दिविषयाकार रहित ही अहङ्काररूपसे घटादिज्ञान अनुभूत होता है दर्पणादिमें मुख जिस प्रकार प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार विषयाकारप्रतिबिम्बित होकर ज्ञान नही प्रतीत होता । दूषणान्तर ( विषयाकारेति ) यदि ज्ञानमे विषयाकारार्पण मानो तो ज्ञान आत्मामें रहता है उसी ज्ञानमें विषयाकार भी अर्पित होनेसे विषयमें दूरत्व समीपत्वादि व्यवहार गगनकुसुम समान होगा । यदि कहो यह दोष क्या देते हो क्षणिकवादीके मतमें इष्टापत्ति है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि शिंशपावृक्ष दूर है अमुक वट वृक्ष बहुत ऊंचा है इत्यादि बडे २ बुद्धिमानोंसे लेकर पामरपर्यन्तको प्रतीति होती है । यह शुक्ति रजतादिकी समान बाधित भी नहीं आकारसमर्पक वृक्षादिक दूर होनेसे ऐसा प्रतीत होता है सो भी नहीं कहसकते क्योंकि दृष्टान्तभूत दर्पणादिमें मुखादिक दूर होनेपर भी दर्पणादिसन्निहितही प्रतीत होता है ॥ ७ ॥ किञ्चार्थादुपजायमानं ज्ञानं यथा तस्य नीलाकारतामनुकरोति तथा यदि जडतामपि तर्ह्यर्थवत् तदपि जडं स्यात् । तथा च वृद्धिमिष्टवतो मूलमपि ते नष्टं स्यादिति महतकष्टमापन्नम् ॥८॥