सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 7, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारतभूमि सब रत्नोंकी प्रसवित्री हे। भारतवर्ष संसारका प्रदर्शनागार कहकर, भूमण्डलमे प्रसिद्ध है। भारतवर्ष प्रकृतिक प्रियतम निकेतन है । प्रकृति देवीका विभिन्न भीमकान्त मूर्त्तिका एकत्र समावेश, भारतमे पूर्णरूपसे विकसित दीख पडता है। या गगनस्पर्शी उत्तुङ्गशृङ्ग समन्वित हिमधवलित पर्वतमाला या उत्ताल तरङ्ग- मय भीतिजनक नीलवर्ण सलिलपूर्ण समुद्र, या बहुदूर प्रगाहिनी आवर्त्तमयी सुवि- स्तीर्ण स्रोतस्वती, या वालुका राशिपूर्ण विभीषिकाकी साक्षात् प्रतिकृति मरुभूमि, या भीषण हिंसक श्वापदसङ्कुल जनमानवविहीन गहन अरण्यानी, या सोवमाउप- द्विशांभित कोलाहलपूर्ण सुन्दरनगरी, या नानाविध सुगन्ध फल पुष्प विभूषित नयन श्रुतिकर सुरम्य उपवन, या लतिका परिवेष्टित सुमधुर पक्षिगव निनादित सुविशाल वृक्षरांजि, या श्यामल शस्य परिशोभित कृषकके यत्न परिरक्षित शस्यक्षेत्र (धान्यका खेत), या यागमग तपस्वियोंका शान्तिरसास्पद तपोवन—भारतवर्षमें किसीके दृश्यका अभाव नहीं है। भारतविभिन्न भाषाभाषी विभिन्न धर्मावलम्बी विभिन्न जातीय लोगोंकी वासभूमि है। भारतवर्ष भिन्न भूमण्डलके किसी प्रदेशमें जाति, धर्म, भाषा वर्ण, स्वभाव और आचारगत सम्पूर्ण वैसादृश्यका इस प्रकार एकत्र सन्निवेश परिलक्षित नही होता। संक्षेपसे, भारतवर्षको क्षुद्रायतन पृथिवी वा छोटा भूमण्डल कहनेसे भी अत्युक्ति दोष नहीं होगा। भारत जिस प्रकार प्रागुक्त मनोमुग्धकर नैसर्गिक दृश्यादिमे जगत्में सबसे श्रेष्ठ एक समय धन एव ज्ञानरत्नसे भी भारत उसीप्रकार श्रेष्ठ आसनपर अधिष्ठित था महामूल्य धनरत्नकी प्रसवित्री कहकर मिसरीय, फिनिसीय, यहूदी, ग्रीक, रोम्यान, आरब और चेनिक (चिनदेशका) प्रभृति नाना प्राचीन वैदेशिक जाति वाणिज्य व्यपदेशसे भारतमें आकर, भारतके धनसे अपना २ धनागार (खजाना) परिपूर्ण किये। भारतका अतुल ऐश्वर्य्यादि दुराशासे विमोहित होकर, नानाजातीय नाना देशीय, दिग्विजयीगण, भारतको अपन करतलगन करनेके लिये विभिन्नसमयमें प्रयासी हुए हैं, एवं निदारुण उत्पीडनमे निरीह भारतवासीको उपयुक्त उत्पीड़ित और भयसन्त्रस्त कर छोडा। रेशमी ओर विजातीय वैदेशिक दस्युदलके पुन पुन आक्रमणमे भारतवर्ष .. विशीर्य्यन ओर पदप्रदानत होना एव भारतकी अतुलनीय धनराशि बारम्बार जाती है बहुतमें वैदेशिक पण्डितगण विभिन्न समयमें धनुकर्णके सिमम्बाट ............ भाषामें भारतकी यशोगीति प्रचारित कर,