सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page-Header] भूमिका । ( ७ ) [/Page-Header]
भारतकी मनोमुग्धकर प्रतिकृति जगतके सामने रखकर, अपनी २ उदारता ओर महानुभावताके उदाहरण दिखला गये हैं । प्राचीन भारत जिस प्रकार धन रत्नोंमे जगत्में सबसे श्रेष्ठ था । जिस समय पृथिवीका अधिकांश देश असभ्य आममांसभोजी अरण्याचारी मनुष्यद्वारा परिपूर्ण था—उस समय भारत सभ्यताके उच्चतम चोटीपर अधिष्ठित होकर, अपने सोभा- ग्यप्रभासे जगत्को मुग्ध ओर पुलकित करता था । जिस समय सम्पूर्ण जगत् घोर तम अज्ञानान्धकारमे समाच्छन्न था, जिस समय ज्ञान आर सभ्यताका क्षीण आलो- कभी युरोप आदि महादेशमें शनैः शनै पादविक्षेपण नहीं प्रसृत होता था,—उस समय भारत विद्या, बुद्धि, ज्ञान और सभ्यताके पूर्ण आलोकसं जगत्को आलोकितकर, अविनश्वर गौरव महिमामे सविशेष गौरवान्वित हुआ था । क्या धर्म, क्या विज्ञान, क्या दर्शन, क्या गणित, क्या ज्योतिष, क्या भैषज्यतत्त्व, क्या काव्य, क्या पुराण, क्या शिल्प, क्या वाणिज्य क्या मात्रा, क्या साहित्य, सर्वविध विषयोंमें भारत संसारके शीर्ष स्थानाय था । भारतका विज्ञान ओर सभ्यता आरव आदिके द्वारा युरोपमें लाया जाकर युरोपके ज्ञान आर सभ्यताको देदीप्यमान आलोकमे समुज्ज्वल किया । ईसवी सन १००० से १७०० पर्य्यन्त भारतके शिष्यस्थानीय अरब, उपदेष्टाके वरणीय पदमें अधिष्ठित रहकर युरोपमे विद्या और ज्ञानकी सुविमलज्योति विकी- र्णपूर्वक, युरोपको समुद्भासित किया है । भारतका सर्वविध विषयक अभ्युदय जिस प्रकार सबकी अपेक्षा प्राचीन, उसी परि- माणसे उसका प्राचीनकालीन आख्यानमय इतिहास विद्यमान नही । विभिन्नप्रदे- शीय राजन्यवर्गकी धारावाहिक वंशावली ओर कीर्त्तिकलाप, एव तदीय आविर्भाव कालादिका विनिर्धारक, वैज्ञानिक इतिहासका प्रवेश द्वारा स्वरूप, सर्वाङ्गसु दर आख्यानमय प्राचीन इतिहास—केवल भारतवर्षहीका क्यो, ग्राम, रोम, मिसर, फिने सिया, एसिरिया, बेबिलन पार्थिया पारस्य ओर चीन प्रभृति किसी देशका सर्वोङ्गीन भावसे विद्यमान नहीं । काल्पनिक उपन्यास ओर जनश्रुति, सभी देशोंमें अति प्राचीनकालीन अतीवसाक्षी इतिहासका वरणीय पदपर समासीन रहा है । किन्तु जो इतिहास अतीतका एकमात्र वर्ष्णीयान् अपक्षपाती साक्षी—जा इतिहास प्रकृत प्र- स्तावसे समाजका अभ्रान्त उपदेष्टा और परिचालक,—जो इतिहास मानवजीवनका और मानवसमाजका यथा यथा प्रतिकृति अङ्कितकर, समाजका आविर्भाव उन्नति और अवनति यथोचित कारण, निर्देशपूर्वक अभ्रान्तरूपसे प्रदर्शन करता—जो इतिहास सुनिपुण शिल्पविद्का सुकौशल विचित्रीत विचित्र फलकी नाई समाजका यथार्थतत्त्व सुस्पष्टरूपसे प्रकट करता है । सुविमल स्वच्छ दर्पणकी नाई जिसमें समाजकी यथायथ प्रतिकृति प्रतिभाषित होती है—उस वैज्ञानिक इतिहासका यथो-