सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका।
(८) पयुक्त उपकरण प्रचुररूपसं सस्कृतसाहित्यमे विद्यमान रहाहै । सस्कृतसाहित्यमें भारतीय आर्यजातिका जातीय जीवन, जातीय इतिहास, जातीय चरित्र, जातीय धर्म, जातीय ज्ञान ओर जातीय विद्या, बुद्धि, जातीय रीति, नीति, जोर जातीय सभ्यता स्वर्णाक्षरमे सुस्पष्टरूपसे लिपिबद्ध हे । भारत किस समय जो अद्वितीय नाइत्रुर, ग्रोट, जिवनवा मेल्ट आविर्भूत होकर, इन सब बहुमूल्य ऐतिहासिक तथ्य एकत्र सङ्ग्रहीनकर जगत्को अच्छीप्रकार दिखलाकर विमोहित करेगा सो भगवान् जाने । जो आर्यजाति अतुत्साहस, विक्रम, तेजस्विता और मनस्विता प्रभावसे भूमण्ड लमें अक्षय कीर्ति लाभकरगयी, जो आर्यजाति एकदा पृथिवीम गन विषयाम सर्वश्रेष्ठ जाति कहकर परिगणित हुई थी । जो आर्यजाति ज्ञान ओर सभ्यताश विमल आलोकमें जगत्को उद्भासित कर, जगत्के शिक्षा गुरु बहुसम्माननार्ह वरणीय पदपर अधिरूढ थी-जिस आर्यजातिके गौरव प्रभावसे भारतवर्षका इतिहासके शी र्षस्थानमें विराज रहा है । जिस आर्यजातिके वंशधर कहकर हमलोग परपददलित होकरभी अद्यापि सभ्यसमाजमे ससम्मानसे परिगृहीत होते है, उसी जगतगुरु आ- र्यजातिके पवित्र कीर्तिपूर्ण इतिहास आज अदृष्टचक्रके आवर्तनसे कीर्ति विलोप कारी करालकालके विस्मृति कबल (ग्रास) में निहित है। व्यास, वाल्मीकि, कालि- दास प्रभृति जिस देशके कवि, - पाणिनि, पतञ्जलि प्रभृति जिस देशके वैयाकरण, कपिल, कणाद और गौतम प्रभृति जिस देशके दार्शनिक - चरक, सुश्रुत आदि जिस देशके चिकित्सक, - मनु, नारद, वृहस्पति, रघुनन्दन प्रभृति जिम देशके धर्मों- पदेष्टा-आर्यभट्ट पराशरादि जिस देशका ज्योतिर्वित्-बुद्ध, शङ्कराचार्य, रामानुज मध्वाचार्य्य आदि जिस देशके धर्म प्रचारक, - मल्लिनाथ, सायनाचार्य आदि जिस देशक भाष्यकार - अमरसिंह, महेश्वर आदि जिस देशके कोषकार - उस भारत विलु- प्तप्राय गौरवके उद्धारसाधनार्थ अतीत्साक्षी इतिहासके आश्रय अवलम्बन करनेक लिये निश्चेष्ट, निष्क्रय परपदानत भारतवासी आर्यसन्तानकी प्रवृत्ति ओर उत्साह उत्पन्न नही होता । जो जाति पूर्वपुरुषाआके कीर्ति कल्याणका यथायोग्य जादर ओर सम्मान करना नहीं जानती, जो जाति आत्मगौरव और जात्माभिमानके मर्म हृदयङ्गम करनेमें समर्थ नहीं होती, उस जातिका अभ्युदय सुदूर परास्त, उस जातिका पतन ओर परपदानति, अवश्यम्भावी । इसी कारण विधाताने भारतके भाग्यमें ऐसी दशाविपर्यय अदृष्ट नेमिका इस प्रकार निदारुण परिवर्तन लिख रक्खा हे एव स्वाधीनताके साथ २ भारतकी विद्या, बुद्धि, ज्ञान, धर्म, कीर्ति, गरिमा, समस्त विलुप्त किया हे जिम भारत निकटसे शिक्षा लाभकर, युरोपादि सभ्यदेश-