सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 10, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका। ९ की इतनी श्रीवृद्धि हुई है,–वही भारत इस समय ज्ञानके लिये युरोपके समीप भि- क्षा प्रार्थी, वही सुविज्ञ भारत इस समय सूत्रसञ्चालित क्रीडापुत्तलीकी नाई निरव- च्छिन्न जडभावापन्न वही भारत इससमय हिताहित बोधशून्य चित्तमें युरोपके अनुकरण करनेम व्यतिव्यस्त है। अमृतलाभकी आशासे आज युरोपीय पण्डितवर्ग बद्धपरिकर होकर भारतके अतुलनीय गौरवका निदानभूत सस्कृतसाहित्य समुद्रमन्थन करते हैं–जान भारतके अतीतज्ञानका अक्षयभण्डार युरोपीय पण्डितोंके अविचलित यत्न, अदम्य उत्साह और दृढतर अध्यवसायमें, जीवनीशक्तिरहित, निमीलितनेत्र और मोहनिद्राशायित भारतवासीके सम्मुखमें उपस्थापित रहा है, भारतवासी निश्चेष्टभावसे उस विस्मयच- क्तित हृदयमे चाहकर देखते हैं। भारतके भूतपूर्व गौरव महिमाके प्रसङ्ग अपने २ देशमें मुक्त कण्ठमे प्रचार पुरःसर, युरोपके मनस्वी पण्डितवर्ग कृतार्थमान्य होते हैं। मृतसञ्जीवनी विद्याप्रभावसे विलुप्तप्राय मस्कृतसाहित्यको पुनर्जीवितकर, भारतके निर्जीव और निष्पन्ददेहमें मृदुमन्द वेगसे ये लोग जीवनीशक्तिके तडितालोक सञ्चालित करते हैं, एव भारतके पूर्वतन अपूर्व कीर्तिकलाप द्वार २ पर डङ्का बजाकर मोहनिद्रामे चिराभिभूत भारतवासीको जगाकर सचेत करते हैं। पुरा तत्त्वा- नुसन्धायी शास्त्रज्ञ युरोपीय पण्डितोंको सौ सौ धन्यवाद, हम लोग उनके प्रदर्शित युक्ति, तर्क, विचार, शक्ति और गवेषणके प्रभावसे, भारतके अनेक अपरिज्ञेयत- त्त्वार्थपय परिज्ञानसे समर्थ होते हैं। सस्कृत साहित्यकी नाई अनन्त रत्नराजिपरिपूर्ण साहित्य ससारम दुर्लभ है। देवभाषा सस्कृतकी नाई मधुरभाषा पृथिवीमें कहीं नहीं है। सस्कृतभाषा और सस्कृतसाहित्य जगत्में सबसे श्रेष्ठ पदपर अधिष्ठित है। सस्कृत साहित्यके अक्षय- भण्डारमे क्या २ अमूल्य रत्नराजि सन्निविष्ट है, सो केवल सस्कृतभाषाम ग्रन्थोंके होनेसे सर्वसाधारणको सम्यक्तया ज्ञात नहीं। आज मैं उन्हीं सस्कृतके अनेक रत्नोंमेंसे “सर्वदर्शनसग्रह” नामक ग्रन्थके भा- षानुवादको कर पाठकोंको अवलोकन कराता हू । इस भारतवर्षम बहुत दिनांसे वैदिकमतके विरुद्ध अनेक बौद्ध, चार्वाक, आर्हत, जैन आदि मत प्रचारित हैं और प्रतिदिन इन मतोंके अतिरिक्त नये २ सम्प्रदाय वा मत बढते जाते हैं, परन्तु उक्त बौद्ध, आदिके ग्रन्थोंको सर्व साधारण लोग नहीं देखते इस कारण प्रत्येक मवान २ मतोंका हाल सब नहीं जानते । सस्कृतमें उक्तप्रतोंके सिद्धान्त वर्णनके लिये श्रीम- ध्वाचार्यजीने “ सर्वदर्शनसग्रह ” नामक ग्रन्थ प्रणयन किया है। जो सस्कृतमं होनेके कारण सर्व साधारणको सुविख्यात नहीं। पर यह ग्रन्थ ऐसा प्रयोजनीय है